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History of India
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मौर्य साम्राज्य की केंद्रीय और प्रांतीय प्रशासनिक व्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' के अनुसार, मौर्य प्रशासन में 'धर्मस्थीय' न्यायालय दीवानी (नागरिक मामलों) से संबंधित अदालतें थीं, जबकि 'कंटकशोधन' न्यायालय फौजदारी (आपराधिक मामलों और राज्य विरोधी गतिविधियों) से संबंधित अदालतें थीं।
  2. 2. सम्राट अशोक के शासनकाल में नियुक्त 'धम्म महामात्रों' का मुख्य कार्य केवल पाटलिपुत्र के केंद्रीय प्रशासनिक अधिकारियों पर नियंत्रण रखना था, तथा प्रांतीय क्षेत्रों में उन्हें किसी भी प्रकार का धार्मिक या नैतिक प्रचार करने का अधिकार नहीं था।
  3. 3. मौर्य काल में 'रज्जुक' नामक अधिकारी मुख्य रूप से भू-माप और राजस्व निर्धारण का कार्य करते थे, जिन्हें अशोक ने अपने शासनकाल के 27वें वर्ष में प्रजा को न्याय प्रदान करने का भी व्यापक अधिकार (प्राणदंड के मामलों सहित) सौंप दिया था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: मौर्यकालीन न्याय व्यवस्था में 'धर्मस्थीय' न्यायालय दीवानी मामलों (नागरिक विवादों और अनुबंधों) की सुनवाई करते थे, जबकि 'कंटकशोधन' न्यायालय फौजदारी मामलों (राज्य और समाज विरोधी अपराधों) से संबंधित थे। कथन 2 गलत है क्योंकि अशोक द्वारा नियुक्त 'धम्म महामात्रों' का अधिकार क्षेत्र केवल केंद्रीय राजधानी तक सीमित नहीं था, बल्कि वे साम्राज्य के सभी प्रांतों और विभिन्न सामाजिक वर्गों में धम्म के प्रचार-प्रसार तथा नैतिक उत्थान के लिए कार्य करते थे। कथन 3 सही है; रज्जुक मूलतः भूमि सर्वेक्षण और राजस्व से जुड़े अधिकारी थे, जिन्हें अशोक ने अपने शासन के 27वें वर्ष में न्यायिक अधिकार भी प्रदान किए थे ताकि वे जनता को निष्पक्ष न्याय दे सकें। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देखें।
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