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History of India
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भक्ति और सूफी आंदोलन के दार्शनिक तथा सामाजिक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित 'अद्वैत वेदांत' के अनुसार ब्रह्म एकमात्र सत्य (परम सत्य) है और जगत मिथ्या है, जिसका खंडन करते हुए रामानुजाचार्य ने 'विशिष्टाद्वैत' दर्शन प्रतिपादित किया, जिसके अनुसार ईश्वर, जीव और जगत पृथक होते हुए भी एक-दूसरे से उसी प्रकार जुड़े हैं जैसे किरणें सूर्य से।
- 2. सूफी संतों के सिलसिले (संप्रदाय) मुख्य रूप से दो भागों में बंटे थे—'बा-शरा' (जो इस्लामिक शरिया कानून के नियमों का सख्ती से पालन करते थे, जैसे चिश्ती और सुहरावर्दी) और 'बे-शरा' (जो शरिया के बंधनों से मुक्त मस्तों या कलंदरों की तरह जीवन जीते थे)।
- 3. भारत में चिश्ती सिलसिले की स्थापना ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में की थी, जबकि इस सिलसिले के प्रसिद्ध संत निजामुद्दीन औलिया ने सात सुल्तानों का शासनकाल देखा था, किंतु उन्होंने कभी भी किसी सुल्तान के दरबार में जाना स्वीकार नहीं किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
दिए गए तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं। मध्यकालीन भारतीय इतिहास में भक्ति और सूफी आंदोलनों ने भारतीय समाज और दर्शन को गहराई से प्रभावित किया। अद्वैत वेदांत और विशिस्टाद्वैत जैसे दार्शनिक मतों के साथ-साथ सूफी संतों के बा-शरा और बे-शरासिलसिले ने आध्यात्मिक समन्वय को बढ़ावा दिया। इस विषय की विस्तृत जानकारी के लिए आप विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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गुप्तकालीन प्रशासन, राजस्व प्रणाली तथा आर्थिक जीवन के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. गुप्त काल में भूमि की माप और उसके वर्गीकरण के लिए 'क्षेत्र' (कृषि योग्य भूमि), 'वापस' या 'वाप्र' (माप की इकाई), और 'अखिल' (बिना जोती गई या परती भूमि) जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता था।
2. गुप्त सम्राटों के शासनकाल में राजा को मिलने वाला भू-राजस्व (कर) सामान्यतः उपज का 1/6 से 1/4 भाग होता था, जिसे 'भाग' या 'भोग' कहा जाता था, जबकि संकटकालीन स्थिति में 'हिरण्य' (नकद कर) और 'उद्रंग' (स्थाई कर) वसूले जाते थे।
3. गुप्तकालीन अर्थव्यवस्था में आंतरिक और बाह्य व्यापार दोनों का उल्लेख मिलता है, जहाँ पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय व्यापारियों ने दक्षिण-पूर्व एशिया (सुवर्णद्वीप) के साथ समुद्री व्यापार को अधिक बढ़ावा दिया, जिससे ताम्रलिप्ती और भृगुकच्छ (बरूच) प्रमुख बंदरगाह के रूप में उभरे।
4. गुप्त साम्राज्य में पुलिस और आंतरिक सुरक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों को 'महादंडनायक' कहा जाता था, तथा न्याय प्रशासन अत्यंत कठोर था जिसमें गुप्तचर विभाग के अधिकारियों को 'दूताभिसारिका' कहा जाता था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक कारणों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजनीतिक कारणों के अंतर्गत लॉर्ड डलहौजी की 'व्यपगत का सिद्धांत' (Doctrine of Lapse) नीति के माध्यम से सतारा, नागपुर और झाँसी के अतिरिक्त अवध का विलय वर्ष 1856 में कुशासन के आधार पर किया गया, जिससे अवध के सैनिकों और पारंपरिक अभिजात वर्ग में गहरा असंतोष व्याप्त हुआ।
2. सामाजिक और धार्मिक कारणों में वर्ष 1850 के 'धार्मिक निर्योग्यता अधिनियम' (Religious Disabilities Act) द्वारा हिंदू धर्म त्यागने वाले व्यक्तियों को भी पैतृक संपत्ति में अधिकार देने का प्रावधान किया गया, जिसे रूढ़िवादी भारतीयों ने ईसाई धर्म के प्रचार और धर्मांतरण का षड्यंत्र माना।
3. आर्थिक कारणों में अंग्रेजों की मुक्त व्यापार नीति और औपनिवेशिक आर्थिक शोषण के कारण भारत के पारंपरिक हस्तशिल्प और कुटीर उद्योग पूरी तरह नष्ट हो गए, क्योंकि ब्रिटिश आयातित वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाकर उन्हें भारतीय बाजारों में संरक्षण प्रदान किया गया था।
4. सैन्य कारणों के तहत वर्ष 1856 के 'सामान्य सेना सेवा अधिनियम' (General Service Enlistment Act) ने बंगाल आर्मी के नए रंगरूटों के लिए आवश्यकता पड़ने पर समुद्र पार विदेश जाकर सेवा देना अनिवार्य कर दिया, जिससे पारंपरिक हिंदू सैनिकों में अपनी जाति और धर्मभ्रष्ट होने का गंभीर भय उत्पन्न हुआ।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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1857 के महान विद्रोह के दौरान कानपुर में विद्रोह के संचालन और उससे जुड़े प्रमुख नेतृत्वकर्ताओं—नाना साहब, तात्या टोपे और अजीमुल्ला खां—की रणनीतिक भूमिका के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नाना साहब ने कानपुर में ब्रिटिश सेनापति सर ह्यूग व्हीलर की सेना को पराजित करने के पश्चात स्वयं को पेशवा घोषित किया और पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र के रूप में ब्रिटिश पेंशन व अधिकारों से वंचित किए जाने के बावजूद औपचारिक रूप से पेशवा की गद्दी संभाली।
2. अजीमुल्ला खां, जो नाना साहब के मुख्य सलाहकार, वक्ता और कूटनीतिक रणनीतिकार थे, ने विद्रोह के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाने के लिए तुर्की (ऑटोमन साम्राज्य) की यात्रा की योजना बनाई थी तथा विद्रोही ताकतों के बीच समन्वय में अहम भूमिका निभाई थी।
3. कानपुर के पतन के बाद तात्या टोपे ने ग्वालियर की सिंधिया सेना को अपने पक्ष में मिला लिया और रानी लक्ष्मीबाई के साथ मिलकर कालपी तथा ग्वालियर के क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध अत्यंत प्रभावी सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया था।
4. कानपुर में अंतिम रूप से पराजय के पश्चात नाना साहब ने ब्रिटिश सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था, जिसके बाद ब्रिटिश अदालत द्वारा मुकदमा चलाकर उन्हें अंडमान और निकोबार की सेल्यूलर जेल में आजीवन कारावास के लिए निर्वासित कर दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) के विभिन्न चरणों, प्रथम गोलमेज सम्मेलन और गांधी-इरविन समझौते के ऐतिहासिक घटनाक्रम के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मार्च 1931 में हस्ताक्षरित गांधी-इरविन समझौते के तहत ब्रिटिश सरकार ने हिंसा के मामलों में संलिप्त अभियुक्तों को छोड़कर शेष सभी राजनीतिक कैदियों को तत्काल रिहा करने तथा समुद्र तट के समीप के निवासियों को अपने उपभोग के लिए बिना कर के नमक बनाने का अधिकार देने पर सहमति व्यक्त की थी।
2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड की अध्यक्षता में लंदन में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन (नवंबर 1930 - जनवरी 1931) में आधिकारिक रूप से भाग लिया था, क्योंकि इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारत के लिए 'पूर्ण स्वराज्य' के प्रस्ताव पर मुहर लगाना था।
3. कराची अधिवेशन (मार्च 1931), जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी, में गांधी-इरविन समझौते को औपचारिक रूप से अनुमोदित किया गया तथा इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार 'मौलिक अधिकार और राष्ट्रीय आर्थिक कार्यक्रम' पर अपने ऐतिहासिक प्रस्ताव को स्वीकार किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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मध्यकालीन भारत के सूफी संप्रदायों और उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चिश्ती संप्रदाय के संतों ने राज्य की सेवा, राजकीय अनुदान और जागीर स्वीकार करने की नीति का कड़ा विरोध किया और 'समां' (संगीत गोष्ठियों) को अपनी आध्यात्मिक साधना का प्रमुख अंग बनाया, जबकि सुहरावर्दी संप्रदाय के संतों ने इसके विपरीत सरकारी अनुदान और शाही संरक्षण स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं किया।
2. नक्शबंदी संप्रदाय, जिसकी स्थापना भारत में ख्वाजा बाकी بالله द्वारा की गई थी, ने संगीत और 'समां' का पूर्ण बहिष्कार किया और रूढ़िवादी सुन्नी इस्लाम के पुनर्स्थापन पर बल देते हुए अकबर की उदार धार्मिक नीतियों का कड़ा विरोध किया।
3. कादिरी संप्रदाय के प्रमुख संत मियां मीर थे, जिन्होंने लाहौर में सिख गुरु अर्जुन देव के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखे, और इस संप्रदाय के अनुयायी मोक्ष प्राप्ति के लिए 'वह्दत-उल-वजूद' (अस्तित्व की एकता) के सिद्धांत के कट्टर समर्थक थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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