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History of India
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गुप्त साम्राज्य एवं मौर्योत्तर काल के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था, व्यापारिक गतिविधियों और मुद्रा प्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. मौर्योत्तर काल की तुलना में गुप्त काल में बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के (दीनार) जारी किए गए, जो यह दर्शाते हैं कि इस काल में लंबी दूरी का अंतरराष्ट्रीय व्यापार अपनी चरम सीमा पर था और रोमन साम्राज्य के साथ व्यापारिक संतुलन भारत के पूरी तरह पक्ष में था।
  2. 2. गुप्तकालीन मुद्रा व्यवस्था में तांबे के सिक्कों की संख्या कुषाण और सातवाहन कालों की तुलना में अत्यंत सीमित मिलती है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि स्थानीय स्तर पर नकद मुद्रा का चलन कम हुआ और वस्तु-विनिमय (Barter system) या ग्रामीण स्वावलंबन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला।
  3. 3. गुप्तोत्तर काल तक आते-आते भारत के विदेशी व्यापार में भारी गिरावट दर्ज की गई, विशेष रूप से छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य तक बीजान्टिन साम्राज्य द्वारा रेशम उत्पादन की तकनीक (Sericulture) सीख लेने के बाद भारतीय रेशम की मांग में भारी कमी आ गई थी।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है क्योंकि यद्यपि गुप्त शासकों ने बड़ी संख्या में सुंदर स्वर्ण मुद्राएं (दीनार) जारी की थीं, किंतु यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार अपनी चरम सीमा पर था। वास्तव में, गुप्त काल के उत्तरार्ध में रोमन साम्राज्य के साथ होने वाला पश्चिमी व्यापार काफी हद तक मंद पड़ चुका था, और कुषाण काल की तुलना में कुल विदेशी व्यापार में गिरावट आई थी। कथन 2 सही है; गुप्त काल में कुषाणों और सातवाहनों की तुलना में तांबे के सिक्के बहुत कम मात्रा में पाए गए हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर मौद्रिक विनिमय में कमी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के स्वावलंबी स्वरूप की ओर बढ़ने का संकेत मिलता है। कथन 3 सही है; छठी शताब्दी ईस्वी के दौरान चीन से रेशम उत्पादन की तकनीक बीजान्टिन साम्राज्य (पूर्वी रोमन साम्राज्य) तक पहुँच जाने के कारण भारतीय रेशम के निर्यात पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा था। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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