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History of India
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भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के द्वितीय चरण (1920 के दशक के उत्तरार्ध) में गठित 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) और उसके प्रमुख नेताओं—भगत सिंह तथा चन्द्रशेखर आज़ाद—के वैचारिक व संगठनात्मक विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में हुई गुप्त बैठक में HSRA की स्थापना की गई थी, जिसमें भगवती चरण बोहरा द्वारा तैयार किए गए घोषणा पत्र 'द फिलॉसफी ऑफ बम' (The Philosophy of Bomb) को संगठन का आधिकारिक वैचारिक दस्तावेज बनाया गया था।
- 2. HSRA ने अपने शुरुआती क्रांतिकारी लक्ष्यों में पारंपरिक अराजकतावाद (Anarchism) और व्यक्तिगत आतंक के स्थान पर मार्क्सवादी-समाजवादी विचारधारा को अपनाया, जिसके तहत भगत सिंह ने यह स्पष्ट किया कि क्रांति का अर्थ केवल कत्ल या हिंसा नहीं, बल्कि व्यवस्था का आमूल-चूल परिवर्तन है।
- 3. सांडर्स हत्याकांड (1928) और असेंबली बम कांड (1929) के उपरांत पुलिस मुठभेड़ में चन्द्रशेखर आज़ाद की शहादत के बाद HSRA का केंद्रीय नेतृत्व पूरी तरह समाप्त हो गया और यह संगठन छोटे-छोटे क्षेत्रीय गुटों में विभाजित होकर राजनीतिक रूप से पूरी तरह निष्क्रिय हो गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में चन्द्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HRA) का पुनर्गठन करके इसे 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) नाम दिया गया। भगवती चरण बोहरा ने 'द फिलॉसफी ऑफ बम' नामक प्रसिद्ध लेख लिखकर इस नए संगठन के समाजवादी उद्देश्यों और वैचारिक आधार को स्पष्ट किया था। कथन 2 सही है: HSRA के क्रांतिकारियों, विशेषकर भगत सिंह और सुखदेव ने व्यक्तिगत आतंकवाद और छिटपुट हिंसा से हटकर मार्क्सवादी समाजवाद को अपनाया। भगत सिंह ने अपने अंतिम दिनों में यह स्पष्ट किया था कि क्रांति का वास्तविक अर्थ मजदूरों और किसानों के पक्ष में शोषणकारी व्यवस्था को बदलना है। कथन 3 गलत है: चन्द्रशेखर आज़ाद की फरवरी 1931 में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहादत के बाद भी HSRA के अन्य नेताओं (जैसे यशपाल, सतगुरु शरण आदि) ने कुछ समय तक उत्तर भारत में क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा था, अतः संगठन तुरंत समाप्त नहीं हुआ था। अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया संदर्भ देख सकते हैं।
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वर्ष 1857 के महान विद्रोह के दौरान लखनऊ और अवध क्षेत्र में बेगम हजरत महल और मौलवी अहमदुल्लाह शाह की भूमिका तथा उनके रणनीतिक संघर्ष के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बेगम हजरत महल ने अपने अल्पवयस्क पुत्र बिरjis कादिर को अवध का नवाब घोषित कर लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व संभाला और ब्रिटिश रेजीडेंसी की घेराबंदी के दौरान सैन्य संचालन का प्रभावी निर्देशन किया।
2. मौलवी अहमदुल्लाह शाह, जिन्हें 'फैजाबाद का डंका शाह' के नाम से भी जाना जाता है, ने अंग्रेजों के विरुद्ध जिहाद का आह्वान किया और चिनहट के युद्ध में ब्रिटिश सेनापति हेनरी लॉरेंस को पराजित करने में प्रमुख सैन्य भूमिका निभाई।
3. लखनऊ के पतन के उपरांत बेगम हजरत महल ने आत्मसमर्पण कर दिया और ब्रिटिश सरकार से पेंशन स्वीकार कर कलकात्ता में निवास करने लगीं, जबकि अहमदुल्लाह शाह रोहिलखंड और नेपाल की तराई में अंग्रेजों के विरुद्ध छापामार युद्ध जारी रखते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
4. ब्रिटिश सेनापति सर कॉलिन कैंपबेल और जेम्स आउट्राम ने अंततः गोरखा रेजिमेंट और अन्य सैन्य टुकड़ियों की सहायता से मार्च 1858 में लखनऊ पर पुनः पूर्ण नियंत्रण स्थापित किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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वर्ष 1857 के विद्रोह के दौरान झांसी और ग्वालियर में रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे के सैन्य अभियानों और उससे जुड़े घटनाक्रमों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रिटिश जनरल ह्यू रोज़ के खिलाफ अत्यंत वीरतापूर्वक झांसी के किले की रक्षा की थी, और झांसी के पतन के बाद वे कालपी पहुँची जहाँ उन्होंने तात्या टोपे के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य बल का गठन किया था।
2. तात्या टोपे ने ग्वालियर के सिंधिया शासक जयाजीराव सिंधिया की सेना को अपने पक्ष में मिलाने में सफलता प्राप्त की, जिसके परिणामस्वरूप सिंधिया को आगरा भागना पड़ा और विद्रोही सैनिकों ने ग्वालियर पर अधिकार कर नाना साहब को पेशवा घोषित कर दिया था।
3. जनरल ह्यू रोज़ ने ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय के युद्ध में रानी लक्ष्मीबाई को पराजित किया, जहाँ 18 जून 1858 को लड़ते हुए रानी वीरगति को प्राप्त हुईं, जबकि तात्या टोपे बच निकलने में सफल रहे और बाद में उन्हें एक स्थानीय जमींदार के विश्वासघात के कारण पकड़कर फांसी दी गई।
4. ग्वालियर के पतन और रानी लक्ष्मीबाई की शहादत के बाद तात्या टोपे ने मध्य भारत और राजस्थान के जंगलों में अंग्रेजों के खिलाफ लंबे समय तक सफल पारंपरिक युद्ध लड़ा, जिसमें उन्हें किसी भी स्थानीय सामंत या जनता का समर्थन प्राप्त नहीं हुआ था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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बिहार में 1857 के महान विद्रोह के दौरान वीर कुंवर सिंह और उनके भाई अमर सिंह के सैन्य नेतृत्व, रणनीतिक अभियानों तथा उनके संघर्ष के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बाबू कुंवर सिंह ने दानापुर के विद्रोही सिपाहियों के साथ मिलकर 25 जुलाई 1857 को आरा पर अधिकार कर लिया था, और ब्रिटिश सेना के विरुद्ध अपने अभियानों के दौरान उन्होंने अंग्रेजों को पराजित करते हुए उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ और बलिया तक के क्षेत्रों में सफल सैन्य गतिविधियाँ संचालित की थीं।
2. ब्रिटिश सेनापति मेजर विंसेंट आयर के नेतृत्व में आरा को पुनः अंग्रेजों के अधीन करने के पश्चात कुंवर सिंह ने अपनी रणनीति बदलते हुए मध्य भारत और अवध की ओर प्रस्थान किया, तथा नाना साहब की सेना के साथ मिलकर लखनऊ और कानपुर के क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरुद्ध निर्णायक लड़ाइयाँ लड़ीं।
3. बाबू कुंवर सिंह की मृत्यु (26 अप्रैल 1858) के पश्चात उनके छोटे भाई अमर सिंह ने कैमूर की पहाड़ियों (रोहतास के जंगलों) से ब्रिटिश सेना के विरुद्ध लंबे समय तक गुरिल्ला (छापामार) युद्ध का सफल संचालन जारी रखा था, और एक समानांतर सरकार स्थापित कर अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था।
4. अमर सिंह को ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर अंततः कलकत्ता की जेल में सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया गया था, जिससे बिहार में 1857 का यह सशस्त्र प्रतिरोध पूरी तरह समाप्त हो गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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दिल्ली सल्तनत के प्रशासनिक विकास और राजस्व व्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इल्तुतमिश ने सल्तनत काल में सर्वप्रथम 'इक्ता प्रणाली' को संस्थागत रूप दिया, जिसके तहत सैनिकों और अधिकारियों को वेतन के बदले भूमियाँ आवंटित की जाती थीं और ये प्रारंभिक दौर में पूर्णतः वंशानुगत थीं।
2. अलाउद्दीन खिलजी ने इक्तादारों की शक्तियों पर अंकुश लगाने और भ्रष्टाचार रोकने के लिए केंद्रीय नियंत्रण को कड़ा किया, तथा 'मुक्ता' और 'वली' द्वारा वसूले जाने वाले अतिरिक्त राजस्व का हिसाब लेने के लिए 'दीवान-ए-मुस्तखराज' नामक नए वित्त विभाग की स्थापना की।
3. मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में कृषि सुधारों के अंतर्गत 'दीवान-ए-कोही' नामक एक नए कृषि विभाग की स्थापना की गई, जिसका मुख्य उद्देश्य लगान चुकाने में असमर्थ किसानों को 'तकावी' (सोंधार) नामक कृषि ऋण प्रदान करना था।
4. फिरोजशाह तुगलक ने सल्तनत काल में जागीरदारी प्रथा और इक्ता व्यवस्था को पुनः वंशानुगत बना दिया, तथा सैनिकों को नकद वेतन देने की प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर उनके वेतन के बदले भूमि का राजस्व देना अनिवार्य कर दिया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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19वीं शताब्दी के सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित 'आत्मीय सभा' (1815) ने मूर्तिपूजा, जातिगत कठोरताओं और निरर्थक कर्मकांडों का कड़ा विरोध करते हुए एकेश्वरवाद के प्रचार पर बल दिया।
2. वर्ष 1867 में केशव चंद्र सेन की प्रेरणा से बंबई में स्थापित 'प्रार्थना समाज' ने मुख्य रूप से अंतरजातीय विवाह, विधवा पुनर्विवाह और स्त्री शिक्षा के प्रोत्साहन के साथ-साथ दलित जातियों के उत्थान के लिए उल्लेखनीय कार्य किए।
3. स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित 'सत्यार्थ प्रकाश' में मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद और पुरोहितवाद का जोरदार खंडन किया गया, किंतु उन्होंने वेदों की अपौरुषेयता को नकारते हुए केवल तार्किकता पर बल दिया।
4. द सोसायटी फॉर द प्रमोशन ऑफ नेशनलिज्म एंड सोशल रिफॉर्म के बैनर तले ज्योतिराव फुले ने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की, जिसका उद्देश्य शूद्रों और अति-शूद्रों को ब्राह्मणवादी वर्चस्व से मुक्त कराना था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से कथन सही हैं?
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