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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग XVII, आठवीं अनुसूची तथा राजनैतिक दलों से संबंधित दलबदल विरोधी कानून के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 344 के उपबंधों के अनुसार, राष्ट्रपति को राजभाषा के संबंध में आयोग गठित करने का अधिकार है, तथा इस आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा एक तीस सदस्यीय समिति (लोकसभा से 20 और राज्यसभा से 10 सदस्य) के गठन का प्रावधान किया गया है।
- 2. संविधान की आठवीं अनुसूची में मूल रूप से चौदह भाषाएँ थीं, किंतु वर्तमान में इसमें कुल बाईस भाषाएँ शामिल हैं, और इसमें सबसे अंत में वर्ष 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली भाषाओं को जोड़ा गया था।
- 3. दसवीं अनुसूची के अंतर्गत दलबदल के आधार पर किसी सांसद या विधायक की निरर्हता से संबंधित प्रश्नों पर अंतिम निर्णय लेने की शक्ति संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी के पास होती है, और सुप्रीम कोर्ट के 'कीशोटो होहो बनाम जाचिला वाद' (1992) के ऐतिहासिक निर्णय के अनुसार पीठासीन अधिकारी का यह निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से पूरी तरह बाहर होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 344 के अनुसार राष्ट्रपति को प्रत्येक दस वर्ष की समाप्ति पर राजभाषा आयोग गठित करने की शक्ति प्राप्त है, और इस आयोग की संस्तुतियों की जाँच के लिए संसद की एक समिति (30 सदस्य: 20 लोकसभा व 10 राज्यसभा) का प्रावधान है। कथन 2 सही है: मूल रूप से आठवीं अनुसूची में 14 भाषाएँ थीं; 21वें संशोधन (1967) से सिंधी, 71वें संशोधन (1992) से कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली, तथा 92वें संशोधन (2003) से बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली जोड़ी गईं, जिससे कुल संख्या 22 हो गई। कथन 3 गलत है: कीशोटो होहो वाद (1992) में सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया था कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
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भारतीय उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की अपीलीय अधिकारिता (Appellate Jurisdiction) तथा संविधान की व्याख्या से जुड़े प्रावधानों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 132 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय में अपील करने के लिए उच्च न्यायालय का यह प्रमाणित करना आवश्यक होता है कि मामले में संविधान के निर्वचन से संबंधित विधि का कोई सारवान प्रश्न अंतर्ग्रस्त है, और इस अनुच्छेद के तहत दीवानी (Civil) मामलों के साथ-साथ फौजदारी (Criminal) मामलों और अधिकरणों के निर्णयों के विरुद्ध भी अपील की जा सकती है।
2. संविधान के अनुच्छेद 134 के अनुसार किसी उच्च न्यायालय के आपराधिक (फौजदारी) मामले में दिए गए निर्णय, अंतिम आदेश या दंडादेश से उच्चतम न्यायालय में अपील तभी की जा सकती है जब उच्च न्यायालय ने अपील में किसी अभियुक्त को बरी करने के आदेश को उलट दिया हो और उसे मृत्युदंड से दंडित किया हो, या उच्च न्यायालय ने अपने अधीनस्थ न्यायालय से किसी मामले को विचार के लिए अपने पास मंगाकर अभियुक्त को मृत्युदंड दे दिया हो।
3. अनुच्छेद 134A के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण-पत्र (Certificate), उच्च न्यायालय द्वारा या तो संबंधित पक्षकार के आवेदन पर या स्वतः (Suo Motu) मौखिक रूप से निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश सुनाए जाने के तुरंत पश्चात दिया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत में 'राष्ट्रपति का अध्यादेश' (Ordinance) अधिकतम कितनी अवधि के लिए प्रभावी रह सकता है?
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