Indian Polity
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भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों (Emergency Provisions) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 352 में संशोधन करके यह जोड़ा गया कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा केवल संपूर्ण भारत के लिए ही की जा सकती है और राष्ट्रपति देश के किसी विशेष भाग तक इसे सीमित नहीं कर सकता है।
- 2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के तहत अनुच्छेद 352 में 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द को प्रतिस्थापित करके 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) शब्द जोड़ा गया, और यह भी अनिवार्य किया गया कि मंत्रिमंडल की लिखित संस्तुति के बिना राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा नहीं कर सकता।
- 3. राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 358 के अंतर्गत मूल अधिकारों का स्वतः निलंबन केवल अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त छह स्वतंत्रताओं पर लागू होता है, जबकि अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को किसी भी परिस्थिति में निलंबित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा ही यह प्रावधान किया गया था कि राष्ट्रपति भारत के किसी भाग विशेष में भी राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा कर सकता है। कथन 2 सत्य है; जनता पार्टी सरकार द्वारा लाए गए 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 ने 'आंतरिक अशांति' शब्द को हटाकर 'सशस्त्र विद्रोह' किया और यह अनिवार्य किया कि केंद्रीय मंत्रिमंडल के लिखित निर्णय के पश्चात ही राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर सकता है। कथन 3 सत्य है; अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 के अधिकार आपातकाल के दौरान स्वतः निलंबित हो जाते हैं, और 44वें संशोधन के बाद से अनुच्छेद 20 और 21 के अधिकारों को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जाएं।
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ब्रिटिश भारत के संवैधानिक और प्रशासनिक इतिहास के संदर्भ में, रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 तथा पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया और उसकी सहायता के लिए एक चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, तथा इसी अधिनियम के अंतर्गत वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक कर दिया गया; राजनीतिक मामलों के प्रबंधन के लिए 'बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल' (Board of Control) की स्थापना की गई, जबकि व्यापारिक मामलों के लिए 'कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स' (Court of Directors) को बरकरार रखा गया, जिससे भारत में 'द्वैध शासन' (Double Government) की शुरुआत हुई।
3. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियमित और नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाया, जिसके तहत कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार करने तथा भारतीयों से उपहार व रिश्वत लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की पदाच्युति, प्रधानमंत्री की नियुक्ति और मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 67(क) के परंतुक के अनुसार उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए राज्यसभा के ऐसे प्रस्ताव द्वारा ही हटाया जा सकता है जिसे राज्यसभा के तत्कालीन सभी सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित किया गया हो और जिससे लोकसभा सहमत हो, किंतु इस प्रस्ताव को प्रस्तुत करने के लिए चौदह दिन की पूर्व लिखित सूचना देना अनिवार्य है।
2. संविधान के अनुच्छेद 75(1) के तहत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा यदि लोकसभा में प्रधानमंत्री बहुमत खो देता है, तो राष्ट्रपति किसी अन्य सांसद को मंत्रिपरिषद के गठन के लिए आमंत्रित कर सकता है, भले ही उस सांसद के पास सदन में स्पष्ट बहुमत का समर्थन न हो।
3. संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है, जिसका विधिक निहितार्थ यह है कि लोकसभा में यदि किसी एक मंत्री के विरुद्ध भी अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) पारित हो जाता है, तो संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना अनिवार्य होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार) के अंतर्गत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों और उससे संबंधित संवैधानिक व्यवस्थाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है, किंतु यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन है तथा राज्य को सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए हिंदुओं के सभी वर्गों के धार्मिक संस्थानों को हिंदुओं के लिए खोलने हेतु विधि निर्माण करने की शक्ति प्रदान करता है।
2. अनुच्छेद 26 के अनुसार प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके किसी अनुभाग को धार्मिक और पूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना और पोषण करने, अपने धर्म के विषयों में कार्यों का प्रबंधन करने, तथा ऐसे संस्थानों की संपत्ति के अर्जन, स्वामित्व और प्रशासन का पूर्ण संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, जिसे राज्य किसी भी परिस्थिति में अपने नियंत्रण में नहीं ले सकता है।
3. अनुच्छेद 27 के तहत किसी भी व्यक्ति को ऐसे करों का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है, जिनकी आय किसी विशिष्ट धर्म की अभिवृद्धि या संरक्षण के लिए विशेष रूप से व्यय की जाती है, जिसका तात्पर्य यह है कि राज्य कर के रूप में एकत्र किए गए धन का उपयोग किसी एक धर्म के विशेष प्रचार के लिए कर सकता है बशर्ते वह संचित निधि से बाहर हो।
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा शहरी स्थानीय शासन के संदर्भ में जोड़ी गई बारहवीं अनुसूची तथा नगरपालिकाओं के गठन एवं कार्यों के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के तहत प्रत्येक राज्य में तीन प्रकार की नगरपालिकाओं के गठन का प्रावधान किया गया है—ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय क्षेत्रों में संक्रमणशील क्षेत्रों के लिए नगर पंचायत, छोटे नगरीय क्षेत्र के लिए नगरपालिका परिषद और बड़े नगरीय क्षेत्र के लिए नगर निगम।
2. नगरपालिकाओं के सभी स्थानों के लिए निर्वाचन प्रत्यक्ष रूप से नगर क्षेत्र के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे मतदाताओं द्वारा किया जाता है, तथा इस अधिनियम में यह भी अनिवार्य किया गया है कि नगर पालिका के वार्ड समितियों (Ward Committees) का गठन केवल दस लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले नगर निगमों के लिए ही किया जाएगा।
3. बारहवीं अनुसूची में नगरपालिकाओं की विधायी शक्तियों और उत्तरदायित्वों से संबंधित कुल 18 विषयों का उल्लेख किया गया है, जिनमें नगर योजना, भूमि उपयोग का विनियमन, आर्थिक और सामाजिक विकास योजनाएं, तथा अग्निशामक सेवाएं जैसे महत्वपूर्ण कार्य शामिल हैं।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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