BaalVikas
Menu
Indian Polity
Asked 2 months ago · Viewed 21 times

भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के सदनों—विधानसभा (Legislative Assembly) और विधान परिषद (Legislative Council)—की संरचना, गठन प्रक्रिया और उनकी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 171 के प्रावधानों के अनुसार किसी राज्य की विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती, किंतु यह संख्या किसी भी स्थिति में चालीस से कम नहीं होगी, सिवाय इसके कि यदि संसद विधि द्वारा कोई विशेष उपबंध करे।
  2. 2. विधान परिषद के कुल सदस्यों का एक-तिहाई हिस्सा स्थानीय निकायों (जैसे नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों) के निर्वाचकों से बने निर्वाचक मंडलों द्वारा चुना जाता है, तथा एक-बाराहवां हिस्सा ऐसे स्नातकों द्वारा चुना जाता है जो उस राज्य के क्षेत्र में कम से कम तीन वर्ष पूर्व ग्रेजुएट हो चुके हों और वहां निवास कर रहे हों।
  3. 3. यदि किसी राज्य की विधानसभा अपने कुल सदस्यों के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से कोई संकल्प पारित कर देती है, तो संसद के लिए यह संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाता है कि वह उस राज्य में विधान परिषद के सृजन या उत्सादन (Abolition) के लिए तुरंत विधि बनाए, और ऐसी विधि को अनुच्छेद 368 के अर्थ के अंतर्गत संविधान संशोधन नहीं माना जाएगा।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 171(1) के अनुसार विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी और न्यूनतम संख्या 40 निर्धारित की गई है (अपवादस्वरूप जम्मू-कश्मीर जब राज्य था तब वहां अलग स्थिति थी)। कथन 2 सही है क्योंकि अनुच्छेद 171(3) के तहत विधान परिषद के निर्वाचन का संयोजन इस प्रकार है: 1/3 स्थानीय निकायों द्वारा, 1/3 विधानसभा सदस्यों द्वारा, 1/6 राज्यपाल द्वारा मनोनीत, 1/12 स्नातकों द्वारा, और 1/12 अध्यापकों द्वारा चुना जाता है। कथन 3 गलत है क्योंकि हालांकि विधानसभा द्वारा संकल्प पारित करने पर संसद विधान परिषद का सृजन या उत्सादन कर सकती है, किंतु संसद इसके लिए बाध्य नहीं होती है, संसद केवल अपनी सामान्य विधाई प्रक्रिया के तहत ऐसा करती है। विस्तृत अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जाएं।
Share:
अगला प्रश्न → भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) और चुनाव सुधारों के संदर्भ… ← पिछला प्रश्न भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) और उसके संशोधनों…

Related Questions

→ भारत के राष्ट्रपति की शक्तियों, विशेष अधिकारों और उनके संवैधानिक कृत्यों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी भी ऐसे मामले में जिसमें दंड ऐसे विषय संबंधी विधि के विरुद्ध दिया गया है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, क्षमादान की शक्ति प्राप्त है, और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार राष्ट्रपति के इस क्षमादान आदेश की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) किसी भी परिस्थिति में नहीं की जा सकती है, भले ही आदेश दुर्भावनापूर्ण (Malafide) या राजनीतिक कारणों से प्रेरित क्यों न हो। 2. अनुच्छेद 111 के अनुसार जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के पश्चात राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है या धन विधेयक के अतिरिक्त किसी अन्य साधारण विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस लौटा सकता है, किंतु यदि संसद उस विधेयक को संशोधनों सहित या बिना संशोधनों के पुनः पारित कर देती है और राष्ट्रपति के पास भेजती है, तो राष्ट्रपति अपनी अनुमति देने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य होता है। 3. अनुच्छेद 361 के अंतर्गत राष्ट्रपति को उसके पदासीन रहने के दौरान किसी भी न्यायालय में उसके किसी भी कृत्य या उसके द्वारा किए गए कार्य के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है, तथा उसके कार्यकाल के दौरान किसी भी न्यायालय द्वारा उसकी गिरफ्तारी या कारावास का कोई आदेश जारी नहीं किया जा सकता है, यद्यपि उसके व्यक्तिगत कृत्यों के संबंध में दो मास की पूर्व लिखित सूचना देकर सिविल कार्यवाही संस्थित की जा सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधनों और आपातकालीन उपबंधों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा अनुच्छेद 352 में संशोधन करके यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा संपूर्ण देश के साथ-साथ देश के किसी एक विशिष्ट भाग तक भी सीमित की जा सकती है, तथा राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई कि वह विभिन्न आधारों पर एक साथ अलग-अलग राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणाएँ कर सके। 2. 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा यह अनिवार्य किया गया कि राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल (Cabinet) का लिखित अनुमोदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है, और इस उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने के एक माह के भीतर कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई विशेष बहुमत द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है। 3. सर्वोच्च न्यायालय के 'मिनर्वा मिल्स वाद (1980)' के ऐतिहासिक निर्णय में यह स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया गया था कि 42वें संविधान संशोधन द्वारा अनुच्छेद 368 में जोड़े गए वे खंड असंवैधानिक हैं जो संसद की संविधान संशोधन की असीमित शक्ति को न्यायालय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर करते थे, क्योंकि न्यायिक समीक्षा संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का एक अभिन्न हिस्सा है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा-राज्यसभा के संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है, और राज्यसभा को इसे पारित करने या अपनी सिफारिशें देने के लिए अधिकतम चौदह दिनों की समयावधि प्राप्त है, तथा यदि राज्यसभा इस अवधि के भीतर विधेयक को वापस नहीं करती है, तो वह दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में वह लोकसभा द्वारा पारित किया गया था, भले ही राज्यसभा ने उसमें संशोधन सुझाए हों। 2. संविधान के अनुच्छेद 108 के अंतर्गत दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुलाने की शक्ति राष्ट्रपति को प्राप्त है, जो साधारण विधेयकों और वित्तीय विधेयकों (Financial Bills श्रेणी-I) के मामले में लागू होती है, किंतु यह संयुक्त बैठक धन विधेयक तथा संविधान संशोधन विधेयक (Constitution Amendment Bill) के मामले में बुलाई जा सकती है, क्योंकि इन दोनों पर दोनों सदनों की संयुक्त सहमति अनिवार्य है। 3. लोकसभा द्वारा पारित किसी साधारण विधेयक को जब राज्यसभा में भेजा जाता है और राज्यसभा उसे अस्वीकार कर देती है या ऐसे संशोधनों को पारित करती है जिससे लोकसभा सहमत नहीं है, तो गतिरोध की स्थिति में यदि लोकसभा विघटित हो जाती है, तो राष्ट्रपति द्वारा आहूत संयुक्त बैठक स्वतः समाप्त (Lapse) हो जाती है, चाहे संयुक्त बैठक की अधिसूचना पहले ही क्यों न जारी कर दी गई हो। → भारतीय संविधान सभा के गठन और उसकी निर्माण प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा किया गया था, तथा इसमें ब्रिटिश प्रांतों के साथ-साथ देशी रियासतों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया था जहाँ रियासतों के प्रतिनिधियों को संबंधित शासकों द्वारा मनोनीत किया जाना था। 2. संविधान सभा द्वारा संविधान के प्रारूप पर विचार करने और उसे अंतिम रूप देने के लिए कुल 22 मुख्य समितियों का गठन किया गया था, जिनमें कार्य संचालन समिति के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद तथा प्रांतीय संविधान समिति के अध्यक्ष सरदार वल्लभभाई पटेल थे। 3. संविधान सभा की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को आयोजित की गई थी, और उसी दिन संविधान सभा ने औपचारिक रूप से भंग होकर भारत की 'अंतरिम संसद' (Provisional Parliament) के रूप में तब तक कार्य जारी रखा जब तक कि वर्ष 1951-52 के आम चुनावों के पश्चात भारत की पहली निर्वाचित संसद का गठन नहीं हो गया। → भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था। 2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है। 3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है। 2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो। 3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.