BaalVikas
Menu
Indian Polity
Asked 2 months ago · Viewed 19 times

भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के अंतर्गत ब्रिटिश संसद द्वारा पारित विभिन्न अधिनियमों और उनके प्रमुख प्रावधानों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के माध्यम से बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, तथा इसी अधिनियम के तहत कलकत्ता में एक सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) की स्थापना की गई जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।
  2. 2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को पृथक् कर दिया गया, जिसके तहत 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' (Board of Control) की स्थापना की गई जो राजनीतिक मामलों की देखरेख करता था और इसे ब्रिटिश कैबिनेट के नियंत्रण में रखा गया।
  3. 3. चार्टर अधिनियम, 1813 के द्वारा बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' बनाया गया तथा संपूर्ण ब्रिटिश भारत के लिए एक ही बजट तैयार करने का प्रावधान किया गया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यों की एक कार्यकारी परिषद बनाई गई। इसी एक्ट के तहत 1774 में कलकत्ता में उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई।
कथन 2 सही है: पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के वाणिज्यिक और राजनीतिक कार्यों को अलग कर दिया गया। राजनीतिक मामलों के लिए 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' और व्यापारिक मामलों के लिए 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' की व्यवस्था की गई।
कथन 3 गलत है: बंगाल के गवर्नर-जनरल को 'भारत का गवर्नर-जनरल' चार्टर अधिनियम, 1833 द्वारा बनाया गया था, 1813 द्वारा नहीं। संपूर्ण ब्रिटिश भारत के लिए केंद्रीकृत विधाई और वित्तीय व्यवस्था का मार्ग भी 1833 के चार्टर अधिनियम से प्रशस्त हुआ था।

अधिक जानकारी के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था के विस्तृत नोट्स देख सकते हैं।
Share:
अगला प्रश्न → भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं… ← पिछला प्रश्न भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों…

Related Questions

→ भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की अधिकारिता, शक्तियों और न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 131 के अनुसार उच्चतम न्यायालय की मूल (Original) अधिकारिता भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच अथवा दो या अधिक राज्यों के बीच किसी कानूनी विवाद में अनन्य रूप से लागू होती है, किंतु यदि ऐसा विवाद किसी ऐसी संधि, समझौते या प्रसंविदा से उत्पन्न होता है जो संविधान के लागू होने से पहले की गई थी और अभी भी प्रवृत्त है, तो ऐसी स्थिति में उच्चतम न्यायालय की यह मूल अधिकारिता उस विवाद पर लागू नहीं होगी। 2. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से विधि या तथ्य के किसी ऐसे प्रश्न पर, जो सार्वजनिक महत्व का है, परामर्श मांगने की शक्ति प्राप्त है, और यदि इस प्रकार का कोई संदर्भ उच्चतम न्यायालय को भेजा जाता है, तो न्यायालय के लिए यह अनिवार्य है कि वह उस पर अपनी राय राष्ट्रपति को संसूचित करे तथा राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई उस सलाह को मानने के लिए पूर्ण रूप से बाध्य होता है। 3. संविधान के अनुच्छेद 137 के अधीन उच्चतम न्यायालय को संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि या संविधान के अनुच्छेद 145 के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, अपने द्वारा दिए गए किसी निर्णय या आदेश का पुनरावलोकन (Review) करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति देश के किसी भी अन्य न्यायालय को प्राप्त नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) की अपीलीय अधिकारिता (Appellate Jurisdiction) और संविधान के व्याख्या से जुड़े संवैधानिक मामलों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 132 के अनुसार, उच्च न्यायालय के किसी सिविल, दांडिक या अन्य कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील उच्चतम न्यायालय में तभी हो सकती है जब संबंधित उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि मामले में संविधान के निर्वचन (Interpretation) से संबंधित विधि का कोई सारवान प्रश्न अंतर्विष्ट है। 2. संविधान के अनुच्छेद 133 के तहत सिविल मामलों में उच्चतम न्यायालय में अपील के लिए यह आवश्यक है कि उच्च न्यायालय यह प्रमाणपत्र दे कि मामले में व्यापक सार्वजनिक महत्व का कोई ऐसा प्रश्न शामिल है जिसका निर्णय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाना आवश्यक है, और इस प्रकार के प्रमाणपत्र के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष मौद्रिक मूल्य (Monetary Value) की न्यूनतम सीमा का प्रावधान अभी भी अनिवार्य रूप से लागू है। 3. संविधान के अनुच्छेद 143 के अधीन राष्ट्रपति को उच्चतम न्यायालय से परामर्श मांगने की शक्ति प्राप्त है, और यदि सार्वजनिक महत्व के किसी प्रश्न पर राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय को संदर्भ भेजा जाता है, तो न्यायालय के लिए यह अनिवार्य है कि वह उस पर अपनी राय राष्ट्रपति को संसूचित करे, किंतु यदि संदर्भ किसी ऐसी पूर्व-संवैधानिक संधि, समझौते या प्रसंविदा से उत्पन्न विवाद से संबंधित है, तो न्यायालय के लिए अपनी राय देना बाध्यकारी नहीं होता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण और मुख्यमंत्री की संवैधानिक स्थिति के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार, राज्यपाल को अपनी कृत्यों का निर्वहन करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख मुख्यमंत्री होगा, तथा यह उपबंध स्पष्ट करता है कि राज्यपाल द्वारा अपने विवेक का प्रयोग करने की शक्ति केवल उन्हीं मामलों तक सीमित है जहाँ संविधान द्वारा या उसके अधीन उसे स्वविवेक से कार्य करने की स्पष्ट छूट दी गई है, और यदि इस बात पर कोई विवाद उत्पन्न होता है कि कोई मामला राज्यपाल के विवेक का विषय है या नहीं, तो राज्यपाल का इस संबंध में किया गया निर्णय अंतिम होगा और किसी भी न्यायालय में उसकी न्यायसमीक्षा (Judicial Review) नहीं की जा सकती है। 2. संविधान के अनुच्छेद 213 के अधीन राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश की वही शक्ति और प्रभाव होता है जो राज्य विधानमंडल के किसी अधिनियम का होता है, किंतु राज्यपाल द्वारा ऐसा कोई भी अध्यादेश राष्ट्रपति के निर्देशों के बिना प्रख्यापित नहीं किया जा सकता यदि उस विषय से संबंधित विधेयक को राज्य विधानसभा में पुनः स्थापित करने के लिए संविधान के अनुसार राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी की आवश्यकता होती। 3. संविधान के अनुच्छेद 164(1) के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है, तथा छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातियों के कल्याण के लिए एक पृथक मंत्री का होना अनिवार्य किया गया है, जिसके प्रभार के अंतर्गत बिहार राज्य को भी 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा शामिल कर लिया गया था, जबकि झारखंड को इस अनिवार्यता से मुक्त रखा गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 और पंचायती राज व्यवस्था के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. 73वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में भाग IX जोड़ा गया है, जो अनुच्छेद 243 से 243-O तक विस्तृत है, और इसके तहत त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली (ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर और जिला स्तर) का प्रावधान किया गया है, किंतु जिन राज्यों की जनसंख्या बीस लाख से कम है, उन्हें मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन न करने की छूट दी गई है। 2. इस अधिनियम के माध्यम से जोड़ी गई ग्यारहवीं अनुसूची में कुल 29 विषयों को शामिल किया गया है, और इन विषयों से संबंधित आर्थिक विकास तथा सामाजिक न्याय की योजनाओं को तैयार करने और उनके कार्यान्वयन की शक्ति पंचायतों को देना राज्यों के लिए पूरी तरह से अनिवार्य (Mandatory) संवैधानिक कर्तव्य है। 3. अनुच्छेद 243-I के उपबंधों के अनुसार, प्रत्येक राज्य का राज्यपाल पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति का पुनरावलोकन करने के लिए हर पांच वर्ष की समाप्ति पर एक 'वित्त आयोग' (Finance Commission) का गठन करेगा, और इस राज्य वित्त आयोग की संरचना, सदस्यों की योग्यता तथा उनके चयन के तरीके का निर्धारण संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा स्वयं अपने विवेक से किया जाता है, जिसमें राज्य विधानमंडल की कोई भूमिका नहीं होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था। 2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है। 3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है। 2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो। 3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.