Indian Polity
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक पदों, उनके कर्तव्यों तथा विशेषाधिकारों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत महान्यायवादी को नियुक्त होने के लिए वही योग्यताएँ होनी चाहिए जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए आवश्यक होती हैं, तथा उसे भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार (Audience) प्राप्त है, किंतु उसे संसद की किसी भी संसदीय समिति का सदस्य बनाए जाने पर उस समिति में मतदान करने का विधिक अधिकार प्राप्त नहीं होता है।
- 2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) का पदभार संभालने वाला व्यक्ति अपने पद की अवधि (6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो) समाप्त होने के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी अन्य कार्यालय या पद का पात्र नहीं रहता है, किंतु वह संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में महान्यायवादी की भाँति भाग ले सकता है और सदन में मतदान भी कर सकता है।
- 3. भारत के महान्यायवादी को अपने कर्तव्यों के पालन में भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार तो है, किंतु वह सरकार का पूर्णकालिक विधिक सलाहकार नहीं होता है और न ही उसे निजी प्रैक्टिस (Private practice) करने से प्रतिबंधित किया गया है, बशर्ते वह सरकार के विरुद्ध किसी मामले में पेश न हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार महान्यायवादी (Attorney General) के लिए उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता होना अनिवार्य है और उसे भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार है। साथ ही, उसे समितियों में बोलने का अधिकार है पर मतदान का अधिकार नहीं है। कथन 2 गलत है क्योंकि CAG को संसद के सदनों की कार्यवाही में भाग लेने और मतदान करने का कोई अधिकार नहीं होता है। कथन 3 गलत है क्योंकि महान्यायवादी को सरकार के पूर्णकालिक विधिक सलाहकार के रूप में कार्य करना होता है और उसे किसी आपराधिक मामले में सरकार के विरुद्ध बचाव करने से मना किया गया है, तथा वह निजी विधिक प्रैक्टिस से पूरी तरह वंचित नहीं है लेकिन कुछ प्रतिबंधों के अधीन है, परंतु वह सरकारी सेवक की श्रेणी में नहीं आता। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों'…
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय (Supreme Court)…
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत आपातकालीन उपबंधों (Emergency Provisions) और उनसे संबंधित संवैधानिक संशोधनों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा केवल 'युद्ध' या 'बाह्य आक्रमण' के आधार पर की जा सकती थी, किंतु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) शब्द को जोड़कर 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द को प्रतिस्थापित किया गया था।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा यह प्रावधान किया गया था कि राष्ट्रपति द्वारा संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा की जा सकती है, तथा अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति दी गई कि वह आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 को छोड़कर अन्य किसी भी मूल अधिकार के प्रवर्तन के लिए न्यायालय में जाने के अधिकार को निलंबित कर सकता है।
3. अनुच्छेद 356 के अंतर्गत किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने की स्थिति में राज्य विधानमंडल की शक्तियां संसद द्वारा प्रयोग की जाती हैं, और 44वें संविधान संशोधन द्वारा यह अनिवार्य कर दिया गया कि राष्ट्रपति शासन की अवधि को एक वर्ष से आगे बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि उस समय पूरे देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो या निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित करे कि उस राज्य में विधानसभा के चुनाव कराना असंभव है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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राज्य की कार्यपालिका के अंतर्गत राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण तथा मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के सत्र में न होने पर अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्यपाल की स्वविवेकिय शक्ति नहीं है, बल्कि वह मंत्रिपरिषद की सलाह से ही ऐसा अध्यादेश जारी करता है, किंतु राज्य सूची के किसी ऐसे विषय पर अध्यादेश जारी करने के लिए राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन की आवश्यकता होती है जिस पर राज्य विधानमंडल में विधेयक प्रस्तुत करने के लिए भी राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति अनिवार्य होती है।
2. अनुच्छेद 164(1) के अनुसार, किसी राज्य के मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातीय कल्याण के लिए पृथक् से एक मंत्री का होना अनिवार्य किया गया है, जिसके लिए मूल संविधान में ही विशेष उपबंध जोड़ा गया था।
3. राज्यपाल के पास यह संवैधानिक विवेकाधिकार होता है कि यदि किसी भी राजनीतिक दल को विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं होता है, तो वह सरकार गठन के लिए सबसे बड़े दल या गठबंधन के नेता को आमंत्रित करने के मामले में अपने स्वविवेक का प्रयोग कर सकता है, और इस संबंध में न्यायिक समीक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध होता है।
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भारतीय संविधान के 74वें संशोधन अधिनियम, 1992 के माध्यम से शहरी स्थानीय शासन (नगरपालिकाओं) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया था। इस संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 74वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान में 'भाग IX-क' जोड़ा गया जिसमें अनुच्छेद 243-P से 243-ZG तक के प्रावधान शामिल हैं, तथा इसके अंतर्गत नगरपालिकाओं के तीन प्रकार (नगर पंचायत, नगरपालिका परिषद और नगर निगम) के गठन का प्रावधान किया गया है।
2. इस संशोधन के तहत प्रत्येक नगरपालिका में महिलाओं के लिए कुल विनिर्मित सीटों का कम से कम एक-तिहाई (33%) स्थान आरक्षित होना अनिवार्य किया गया है, किंतु यह आरक्षण केवल प्रत्यक्ष रूप से चुने जाने वाले सदस्यों तक ही सीमित है, अध्यक्षों (Chairpersons) के पदों पर महिलाओं के लिए ऐसा कोई संवैधानिक आरक्षण अनिवार्य नहीं है।
3. नगरपालिकाओं के वित्तीय संसाधनों की समीक्षा और उनके बीच करों के बँटवारे की सिफारिश करने के लिए प्रत्येक राज्य में एक 'राज्य वित्त आयोग' (State Finance Commission) के गठन का प्रावधान अनुच्छेद 243-Y के अंतर्गत किया गया है, जो पंचायतों और नगरपालिकाओं दोनों के वित्तीय मामलों की संस्तुति राज्यपाल को सौंपता है।
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राज्य की कार्यपालिका के संदर्भ में राज्यपाल और मुख्यमंत्री की शक्तियों, संवैधानिक स्थिति तथा उनके पारस्परिक संबंधों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को अपनी कृतियों के निर्वहन में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा, किंतु यदि कोई प्रश्न यह उठता है कि क्या कोई विषय ऐसा है जिसके संबंध में संविधान द्वारा या उसके अधीन राज्यपाल को अपने विवेक से कार्य करना अपेक्षित है, तो राज्यपाल द्वारा अपने विवेक से किया गया निर्णय अंतिम होगा और उसके इस निर्णय की विधिुधता को किसी भी न्यायालय में इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है कि उसे अपने विवेक से कार्य करना चाहिए था या नहीं।
2. संविधान के अनुच्छेद 164 के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है, और राज्यपाल मंत्रिपरिषद के किसी सदस्य को व्यक्तिगत रूप से भी पदच्युत (Dismiss) कर सकता है, भले ही मुख्यमंत्री उसकी संस्तुति न करे।
3. राज्य के महाधिवक्ता (Advocate-General) की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 165 के तहत राज्यपाल द्वारा की जाती है, और वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, तथा उसे राज्य के किसी भी न्यायालय में सुनवाई का अधिकार प्राप्त होता है, और राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों (यदि द्विसदनीय व्यवस्था हो) या उनकी समितियों में बोलने तथा भाग लेने का अधिकार तो होता है, किंतु उसे मतदान करने का कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं होता है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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