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Indian Polity
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भारतीय संविधान की प्रस्तावना (उद्देशिका) में उल्लिखित शब्दों और उनके ऐतिहासिक तथा वैधानिक संदर्भों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी' (Socialist) और 'पंथनिरपेक्ष' (Secular) शब्दों को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था, किंतु ये दोनों शब्द और 'अखंडता' शब्द मूल उद्देश्य प्रस्ताव का हिस्सा नहीं थे, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की विशेष सिफारिश पर शामिल किया गया था।
  2. 2. 'प्रस्तावना संविधान का भाग है या नहीं' इस पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का क्रम देखें तो 'बेरूबारी यूनियन वाद' (1960) में न्यायालय ने प्रस्तावना को संविधान का अंग मानने से इंकार कर दिया था, जबकि 'केशवानंद भारती वाद' (1973) और 'एलआईसी ऑफ़ इंडिया वाद' (1995) में इसे स्पष्ट रूप से संविधान का एक अभिन्न अंग स्वीकार किया गया।
  3. 3. प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty, Equality and Fraternity) के आदर्शों को रूसी क्रांति (1917) से प्रेरित होकर अपनाया गया है, जबकि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के आदर्श को फ्रांसीसी क्रांति (1789) से लिया गया है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है क्योंकि 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्दों को 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया था, लेकिन इन्हें 'स्वर्ण सिंह समिति' की सिफारिश पर नहीं जोड़ा गया था (स्वर्ण सिंह समिति का संबंध मूल कर्तव्यों से था)। कथन 2 सत्य है; बेरूबारी यूनियन बाद (1960) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं है, लेकिन केशवानंद भारती वाद (1973) तथा एलआईसी ऑफ़ इंडिया वाद (1995) में न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावना संविधान का एक अभिन्न अंग है। कथन 3 असत्य है क्योंकि प्रस्तावना में 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के आदर्श को **फ्रांसीसी क्रांति (1789)** से लिया गया है, जबकि 'न्याय (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक)' के आदर्श को **रूसी क्रांति (1917)** से प्रेरित होकर शामिल किया गया है (यहाँ दोनों के स्रोत आपस में उलट दिए गए हैं)। भारतीय राजव्यवस्था के ऐसे महत्वपूर्ण और विस्तृत विषयों के अध्ययन के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पोर्टल पर विजिट करें।
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