Indian Polity
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत 'विधानसभा' और 'विधान परिषद' की संरचना, निर्वाचन पद्धतियों तथा उनकी विधाई शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार, किसी राज्य की विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या उस राज्य की विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती, और विधान परिषद के सदस्यों का एक-तिहाई भाग राज्य के ऐसे स्नातकों द्वारा निर्वाचित होता है जो कम से कम तीन वर्ष पूर्व ग्रेजुएट हो चुके हैं।
- 2. विधान परिषद के कुल सदस्यों का बारहवाँ हिस्सा (1/12th) ऐसे अध्यापकों द्वारा चुना जाता है जो राज्य के भीतर कम से कम तीन वर्षों से माध्यमिक विद्यालयों या उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षण कार्य कर रहे हैं।
- 3. साधारण विधेयक के मामले में राज्य विधान परिषद की स्थिति अत्यंत कमजोर होती है, क्योंकि विधान परिषद किसी साधारण विधेयक को प्रथम बार में अधिकतम 3 महीने और दूसरी बार में अधिकतम 1 महीने यानी कुल 4 महीने तक ही रोक सकती है, तथा दोनों सदनों के बीच गतिरोध को समाप्त करने के लिए संसद की भांति 'संयुक्त बैठक' (Joint Sitting) का प्रावधान राज्य विधानमंडल के लिए संविधान में किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 171 के अनुसार विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या विधानसभा के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती और इसका एक-तिहाई भाग स्नातकों द्वारा चुना जाता है। कथन 2 भी सही है क्योंकि विधान परिषद के कुल सदस्यों का 1/12वां हिस्सा (1/12th) राज्य के माध्यमिक विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों द्वारा चुना जाता है। कथन 3 गलत है क्योंकि राज्य विधानमंडल में संसद की तरह 'संयुक्त बैठक' (Joint Sitting) का कोई प्रावधान नहीं है; राज्य विधानसभा की स्थिति यहाँ सर्वोपरि होती है। अधिक जानकारी के लिए भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पढ़ें।
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत 'विधानसभा' (Legislative Assembly) और 'विधान परिषद'…
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भारतीय संविधान के भाग III (मूल अधिकार - अनुच्छेद 12-35) के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों और उनके न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 13 के अंतर्गत 'विधि' (Law) शब्द के व्यापक दायरे में संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए अधिनियमों के अलावा अध्यादेश, आदेश, उप-विधि, नियम, विनियम तथा रूढ़ि या प्रथा (Custom or Usage) को भी शामिल किया गया है, यदि वे भाग III के प्रावधानों का उल्लंघन करती हैं तो उन्हें शून्य घोषित किया जा सकता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने 'ऐडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला' (1976) के ऐतिहासिक निर्णय में यह प्रतिपादित किया था कि राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है, जिसे बाद में 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा संवैधानिक रूप से स्पष्ट कर दिया गया।
3. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत संवैधानिक उपचारों के अधिकार को डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 'संविधान का हृदय और आत्मा' कहा था, तथा सर्वोच्च न्यायालय ने 'चंद्र कुमार मामले' (1997) में यह निर्णय दिया कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है, जिसे संसद द्वारा भी किसी सांविधिक न्यायाधिकरण (Tribunal) को प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम, 1992 के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं के गठन, संरचना और उनके वित्तीय प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस अधिनियम के तहत अनुच्छेद 243-C में यह प्रावधान किया गया है कि किसी भी राज्य की पंचायत के सभी स्तरों पर (ग्राम, मध्यवर्ती और जिला स्तर) अध्यक्षों के पद और निर्वाचित सदस्यों के पद दोनों के लिए अनुसूचित जातियों (SCs) और अनुसूचित जनजातियों (STs) के वास्ते उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों के आरक्षण का प्रावधान अनिवार्य रूप से किया गया है।
2. संविधान के अनुच्छेद 243-I के अनुसार प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, इस अधिनियम के प्रारंभ से एक वर्ष के भीतर और उसके पश्चात प्रत्येक पाँचवें वर्ष की समाप्ति पर, पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए एक 'राज्य वित्त आयोग' (State Finance Commission) का गठन करेगा, जो राज्यपाल को यह संस्तुति करेगा कि राज्य द्वारा लगाए जाने वाले करों और शुल्कों के आगमों को पंचायतों के बीच किस प्रकार विभाजित किया जाए।
3. 73वें संविधान संशोधन के द्वारा पंचायतों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करते हुए ग्यारहवीं अनुसूची में कुल 29 कार्यकारी विषय जोड़े गए, जिन पर विधि बनाने और योजनाएँ तैयार करने की शक्ति पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधीन रखी गई है, क्योंकि पंचायती राज एक समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण तथा सीमाओं में परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किसी नए राज्य के निर्माण, उसके क्षेत्रफल में वृद्धि या कमी, या उसके नाम में परिवर्तन से संबंधित कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित नहीं किया जा सकता है।
2. अनुच्छेद 3 के अंतर्गत राज्य की सीमाओं या नाम में परिवर्तन करने के लिए यदि राष्ट्रपति द्वारा संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास वह विधेयक मत व्यक्त करने के लिए भेजा जाता है, तो राज्य विधानमंडल द्वारा निर्धारित या अनुमत अवधि के भीतर व्यक्त किया गया मत (विचार) संसद या राष्ट्रपति के लिए पूर्ण रूप से बाध्यकारी होता है।
3. अनुच्छेद 4 के प्रावधानों के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश या गठन तथा राज्यों की सीमाओं या नामों में परिवर्तन के लिए बनाई जाने वाली विधियों को संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' नहीं माना जाएगा, अर्थात इन्हें संसद द्वारा साधारण बहुमत से पारित किया जा सकता है।
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भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और लोकसभा तथा राज्यसभा की शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 107 के प्रावधानों के अनुसार, लोकसभा में लंबित कोई भी साधारण विधेयक (Ordinary Bill) जो राज्यसभा द्वारा पारित नहीं किया गया है, लोकसभा के विघटन पर व्यपगत (Lapse) हो जाता है, किंतु यदि कोई विधेयक राज्यसभा में लंबित है और जिसे लोकसभा ने पारित नहीं किया है, तो वह लोकसभा के विघटन पर व्यपगत नहीं होता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत बुलाई जाने वाली संसद की संयुक्त बैठक (Joint Sitting) की अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है, और यदि लोकसभा अध्यक्ष अनुपस्थित हैं, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष उसकी अध्यक्षता करता है, तथा दोनों के भी अनुपस्थिति की स्थिति में राज्यसभा के उपसभापति द्वारा इसकी अध्यक्षता की जाती है, क्योंकि राज्यसभा का सभापति (उपराष्ट्रपति) कभी भी संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 111 के अनुसार, जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया जाता है, तो उसे राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है; राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति दे सकता है या रोक सकता है, किंतु यदि वह धन विधेयक (Money Bill) है, तो राष्ट्रपति न तो उसे अपनी अनुमति रोक सकता है और न ही संसद के पुनर्विचार के लिए वापस लौटा सकता है।
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भारतीय संविधान के भाग-IV के अंतर्गत वर्णित 'राज्य के नीति निर्देशक तत्वों' (DPSP - अनुच्छेद 36-51) की प्रकृति, संशोधनों और न्यायिक व्याख्या के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 39(b) और 39(c) के अंतर्गत निहित नीति निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावी बनाने के लिए संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाई गई किसी विधि को इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, और यह संरक्षण मूल संविधान में ही निहित था जिसे बाद में 42वें संविधान संशोधन द्वारा विस्तारित किया गया था।
2. निर्देशक तत्वों को न्यायपालिका द्वारा अपरिवर्तनीय (Non-justiciable) घोषित किया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह स्पष्ट किया है कि मूल अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं और इनके बीच का संतुलन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है।
3. अनुच्छेद 48 के तहत राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने के प्रयास करेगा, और विशेष रूप से गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परीक्षण और सुधार के लिए तथा उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा, और यह एक समाजवादी विचारधारा पर आधारित नीति निर्देशक तत्व है।
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भारतीय संविधान के भाग I के अंतर्गत 'संघ एवं उसके राज्य क्षेत्र' (अनुच्छेद 1-4) और नए राज्यों के निर्माण या सीमा परिवर्तन की विधायी प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 2 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि वह संघ में नए राज्यों का प्रवेश या उनकी स्थापना ऐसे निबंधनों और शर्तों पर कर सके जो वह ठीक समझे, जबकि अनुच्छेद 3 के तहत संसद को मौजूदा राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन करने की शक्ति प्रदान की गई है।
2. अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के निर्माण या किसी राज्य के क्षेत्र, सीमा या नाम में परिवर्तन करने वाला कोई भी विधेयक संसद के किसी भी सदन में केवल तभी प्रस्तुत किया जा सकता है जब राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश प्राप्त हो, और राष्ट्रपति द्वारा ऐसा विधेयक संबंधित राज्य के विधानमंडल के पास उसकी राय जानने के लिए भेजा जाना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही राज्य विधानमंडल द्वारा दी गई राय को मानना संसद के लिए बाध्यकारी न हो।
3. अनुच्छेद 4 के स्पष्ट प्रावधान के अनुसार, अनुच्छेद 2 या अनुच्छेद 3 के तहत नए राज्यों के प्रवेश, स्थापना, या राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित किए गए कानून संविधान के अनुच्छेद 368 के प्रयोजन के लिए 'संविधान संशोधन' माने जाएंगे, जिसके लिए संसद के विशेष बहुमत तथा आधे राज्यों के विधानमंडलों के अनुसमर्थन की अनिवार्य आवश्यकता होती है।
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