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Indian Polity
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भारतीय संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निर्देशक तत्वों (DPSP) और उनके न्यायिक मूल्यांकन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 38 में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित है कि राज्य, ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करेगा जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, और राज्य आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं तथा अवसरों की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा (जिसे 44वें संविधान संशोधन, 1978 द्वारा जोड़ा गया था)।
- 2. सर्वोच्च न्यायालय ने 'केशवानंद भारती मामले' (1973) और 'मिनर्वा मिल्स मामले' (1980) में यह प्रतिपादित किया कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं, तथा संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) इन दोनों के बीच संतुलन और सामंजस्य पर टिकी हुई है।
- 3. अनुच्छेद 48A के अंतर्गत पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्द्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा करने का निर्देश दिया गया है, जिसे मूल संविधान में ही शामिल कर लिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 38(2) के तहत आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को कम करने का निर्देश देने वाला प्रावधान मूल संविधान में नहीं था, बल्कि इसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा अंतःस्थापित किया गया था; किंतु अनुच्छेद 38(1) का मूल प्रावधान संविधान में पहले से ही मौजूद था। कथन 2 सत्य है क्योंकि 'मिनर्वा मिल्स मामला (1980)' और 'केशवानंद भारती मामला (1973)' में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व एक रथ के दो पहियों के समान हैं और इनके बीच संतुलन संविधान की मूल विशेषता है। कथन 3 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 48A (पर्यावरण संरक्षण) को मूल संविधान में नहीं, बल्कि 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था। DPSP के विस्तृत अध्ययन के लिए आप भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था पर जा सकते हैं।
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नीति आयोग (NITI Aayog) ने किस पूर्ववर्ती संस्था का स्थान लिया?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत अंतर-राज्यीय परिषद् (Inter-State Council) और जल विवादों के न्यायनिर्णयन से संबंधित प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत अंतर-राज्यीय परिषद् की स्थापना का अधिकार केवल संसद को प्राप्त है, न कि राष्ट्रपति को, क्योंकि यह केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के विभाजन को नियंत्रित करती है।
2. अंतर-राज्यीय परिषद् एक विधिक (Statutory) निकाय है, न कि संवैधानिक निकाय, क्योंकि मूल संविधान में इसका कोई उल्लेख नहीं था और इसे संसद द्वारा बनाए गए किसी अधिनियम के तहत वर्ष 1990 में पहली बार स्थापित किया गया था।
3. अनुच्छेद 262 के अंतर्गत संसद को यह शक्ति दी गई है कि वह विधि द्वारा किसी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण के संबंध में किसी विवाद या परिवाद के न्यायनिर्णयन के लिए उपबंध कर सकेगी और यह भी उपबंध कर सकती है कि ऐसे किसी भी विवाद में सर्वोच्च न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय की अधिकारिता का प्रयोग नहीं होगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 67 के अनुसार उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए राज्यसभा द्वारा अपने तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प और लोकसभा की सहमति आवश्यक होती है, किंतु इस प्रकार के संकल्प को प्रस्तुत करने से कम से कम 14 दिन पूर्व उपराष्ट्रपति को लिखित सूचना देना अनिवार्य है।
2. संविधान के अनुच्छेद 75(2) के अनुसार केंद्रीय मंत्रिपरिषद के मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बने रहते हैं, जिसका तात्पर्य यह है कि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत सलाह पर किसी भी मंत्री को बिना लोकसभा के अविश्वास प्रस्ताव के भी उसके पद से हटा सकता है।
3. 'सामूहिक उत्तरदायित्व' (Collective Responsibility) के सिद्धांत के अंतर्गत लोकसभा में प्रधानमंत्री या मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर संपूर्ण मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है, और यदि किसी एकल मंत्री के विरुद्ध लोकसभा में कोई विशेष नीतिगत निंदा प्रस्ताव (Censure Motion) या अविश्वास पारित हो जाता है, तो भी पूरी सरकार को त्यागपत्र देना अनिवार्य होता है।
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भारतीय संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति, पदच्युति और प्रधानमंत्री तथा केंद्रीय मंत्रिपरिषद के संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 66 के अनुसार भारत के उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सभी सदस्यों से मिलकर बनने वाले निर्वाचक गण द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा होता है, जिसमें संसद के मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं, किंतु राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित या मनोनीत सदस्यों को इस निर्वाचक गण में कोई स्थान नहीं दिया गया है।
2. उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने के लिए आवश्यक प्रस्ताव (संकल्प) केवल राज्यसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है, और लोकसभा में इस प्रकार के प्रस्ताव को पेश करने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है, बशर्ते कि इस आशय का प्रस्ताव राज्यसभा द्वारा अपने तत्सम उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के पूर्ण बहुमत (Absolute Majority) से पारित किया जाए तथा लोकसभा उसकी साधारण बहुमत से सहमति दे।
3. अनुच्छेद 75 के उपबंधों के तहत प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती है, तथा संविधान के अनुच्छेद 75(3) में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित किया गया है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होगी, जिसका अर्थ यह है कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव केवल संपूर्ण मंत्रिपरिषद के विरुद्ध ही लाया जा सकता है, किसी एक व्यक्तिगत मंत्री के विरुद्ध नहीं।
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भारतीय संविधान के ऐतिहासिक विकास के क्रम में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित अधिनियमों और उनके विशिष्ट प्रावधानों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 के द्वारा बंगाल के गवर्नर को 'बंगाल का गवर्नर-जनरल' पदनाम दिया गया तथा उसकी सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया, और इसी अधिनियम के अंतर्गत वर्ष 1774 में कलकत्ता में एक उच्चतम न्यायालय की स्थापना की गई जिसके प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा इम्पे थे।
2. पिट्स इंडिया एक्ट, 1784 द्वारा कंपनी के राजनैतिक और वाणिज्यिक कार्यों के बीच अंतर किया गया तथा नियंत्रण बोर्ड (Board of Control) के माध्यम से ब्रिटिश सरकार का कंपनी के नागरिक, सैन्य और राजस्व संबंधी मामलों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो गया, जिससे भारत में 'द्वैध शासन' की शुरुआत हुई।
3. चार्टर अधिनियम, 1813 के द्वारा भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया, किंतु चीन के साथ व्यापार और चाय के व्यापार पर कंपनी का एकाधिकार अगले 20 वर्षों के लिए सुरक्षित रखा गया।
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