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BPSC TRE 4.0
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक इतिहास और इसके अधिवेशनों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन (1885) की अध्यक्षता व्योमेश चंद्र बनर्जी द्वारा बॉम्बे में की गई थी, जिसमें कुल 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था, और इस अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी के सुझाव पर संगठन का नाम 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' किया गया था।
- 2. कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन (1886) की अध्यक्षता कलकत्ता में दादाभाई नौरोजी ने की थी, इसी अधिवेशन के दौरान 'राष्ट्रीय कांग्रेस' का विलय सुरेंद्रनाथ बनर्जी की संस्था 'इंडियन नेशनल कांफ्रेंस' में कर दिया गया था।
- 3. कांग्रेस के तीसरे मद्रास अधिवेशन (1887) के अध्यक्ष बदरुद्दीन तैयबजी थे, जो इस पद को संभालने वाले पहले मुस्लिम अध्यक्ष थे, और इसी अधिवेशन के दौरान उन्होंने 'कांग्रेसमैन बनो' का नारा देते हुए मुसलमानों से राष्ट्रीय आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील की थी।
- 4. इलाहाबाद में आयोजित कांग्रेस के चौथे अधिवेशन (1888) के अध्यक्ष जॉर्ज यूल थे, जो कांग्रेस के पहले ब्रिटिश अध्यक्ष थे, और इस अधिवेशन के आयोजन में स्थानीय गवर्नर लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस को पूर्ण प्रशासनिक सहयोग प्रदान किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1, 2 और 3 पूर्णतः सत्य हैं। प्रथम अधिवेशन बॉम्बे में डब्ल्यू.सी. बनर्जी की अध्यक्षता में हुआ था, दूसरा अधिवेशन कलकत्ता में दादाभाई नौरोजी की अध्यक्षता में हुआ जहाँ 'इंडियन नेशनल कांफ्रेंस' का विलय कांग्रेस में हुआ, और तीसरे मद्रास अधिवेशन में बदरुद्दीन तैयबजी पहले मुस्लिम अध्यक्ष बने। किंतु कथन 4 असत्य है क्योंकि लॉर्ड डफरिन ने कांग्रेस की स्थापना के समय इसका समर्थन नहीं किया था बल्कि अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में कांग्रेस की कटु आलोचना की थी, हालांकि जॉर्ज यूल पहले ब्रिटिश अध्यक्ष थे। अपनी तैयारी को और मजबूत करने के लिए बिहार शिक्षक भर्ती परीक्षा पोर्टल पर विजिट करें।
Related Questions
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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उद्भव, उसके शुरुआती अधिवेशनों, वैचारिक बहसों तथा महत्वपूर्ण प्रस्तावों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कांग्रेस के वर्ष 1896 के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता रहमतुल्ला सयानी ने की थी, इसी अधिवेशन में पहली बार बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित 'वंदे मातरम्' गीत गाया गया था और दादाभाई नौरोजी के 'धन की निकासी' (Drain of Wealth) के सिद्धांत को औपचारिक रूप से स्वीकार किया गया था।
2. वर्ष 1905 के बनारस अधिवेशन में नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच उत्पन्न तीव्र वैचारिक मतभेदों के कारण 'स्वदेशी' और 'बहिष्कार' आंदोलन के प्रस्ताव को केवल बंगाल तक सीमित रखने पर सहमति बनी, जबकि गरमपंथी इसे पूरे देश में लागू करना चाहते थे।
3. वर्ष 1922 के गया अधिवेशन की अध्यक्षता चित्तरंजन दास (देशबंधु) ने की थी, जिसमें असहयोग आंदोलन की असफलता के बाद कांग्रेस के भीतर 'परिवर्तनवादियों' (Pro-changers) द्वारा विधान परिषदों में प्रवेश करने की वकालत की गई थी, किंतु इस प्रस्ताव के पराजित होने के बाद सी.आर. दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस से अलग होकर 'स्वराज पार्टी' का गठन किया था।
4. वर्ष 1938 के हरिपुरा (गुजरात) अधिवेशन की अध्यक्षता सुभाष चंद्र बोस ने की थी, जिसमें राष्ट्रीय योजना समिति (National Planning Committee) का गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू बनाए गए थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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धन विधेयक पेश किया जा सकता है
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कथन (A): केर्च जलडमरूमध्य भू-राजनीति में महत्वपूर्ण है। कारण (R): यह काला सागर और अजोव सागर को जोड़ता है।
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वायुदाब, आर्द्रता एवं पवन संचार तथा चक्रवात के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कोरियोलिस बल (Coriolis Force) पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होता है, जो उत्तरी गोलार्ध में पवनों को उनकी मूल दिशा के दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विक्षेपित कर देता है, और यह बल विषुवत वृत्त (Equator) पर अधिकतम तथा ध्रुवों पर शून्य होता है।
2. सापेक्ष आर्द्रता (Relative Humidity) दिए गए तापमान पर हवा में मौजूद जलवाष्प की वास्तविक मात्रा और उसी तापमान पर हवा की जलवाष्प धारण करने की अधिकतम क्षमता का प्रतिशत अनुपात होती है, और यह तापमान बढ़ने पर घटती है।
3. उष्णकटिबंधीय चक्रवातों (Tropical Cyclones) को बंगाल की खाड़ी में 'चक्रवात' (Cyclone), कैरिबियन सागर में 'हरिकेन' (Hurricane) तथा चीन सागर में 'टाइफून' (Typhoon) के नाम से जाना जाता है, और इनके केंद्र में 'चक्रवात की आँख' (Eye of the Cyclone) होती है जो अत्यधिक कम वायुदाब और शांत मौसम का क्षेत्र होती है।
4. पछुआ पवनें (Westerlies) उपोष्ण कटिबंधीय उच्च दाब पेटियों से उप-ध्रुवीय निम्न दाब पेटियों की ओर प्रवाहित होती हैं, और पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में महाद्वीपों के पश्चिमी भागों पर भू-भाग की अधिकता के कारण ये पवनें बहुत अधिक तीव्र और व्यवस्थित रूप से चलती हैं, जिन्हें 'गर्भवती चालीस' (Roaring Forties) कहा जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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1757 से 1857 के मध्य ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के विरुद्ध भारत में हुए विभिन्न जन आंदोलनों और जनजातीय विद्रोहों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संन्यासी विद्रोह (1770-1820) बंगाल में मुख्य रूप से धार्मिक नेतृत्व के अंतर्गत हुआ था, जिसमें किसानों, विस्थापित जमींदारों और सैनिकों ने मिलकर ब्रिटिश कंपनी की कोठियों और खजानों पर हमले किए थे, तथा बंकिम चंद्र चटर्जी के प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंदमठ' का आधार यही विद्रोह बना था।
2. कोल विद्रोह (1831-1832) छोटा नागपुर क्षेत्र (राँची, सिंहभूम, हजारीबाग आदि) में भूमि कर की दरों में वृद्धि और बाहरी लोगों (दिकुओं) द्वारा आदिवासियों के पारंपरिक भूमि अधिकारों के हनन के विरुद्ध हुआ था, जिसका नेतृत्व बुद्धू भगत और जोआ भगत ने किया था।
3. संथाल विद्रोह या 'हूल' (1855-1856) राजमहल पहाड़ियों के दनु-कंटार क्षेत्र में साहूकारों, महाजनों और पुलिस के दमनकारी अत्याचारों के खिलाफ हुआ था, जिसके प्रमुख नेता सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव थे, और इस विद्रोह के बाद अंग्रेजों को 'संथाल परगना' का गठन करना पड़ा था।
4. पागलपंथी विद्रोह एक अर्द्ध-धार्मिक और राजनीतिक आंदोलन था जो असम के कामरूप और गोलपारा क्षेत्र में करम शाह और उनके पुत्र टीपु शाह के नेतृत्व में जमींदारों व ब्रिटिश टैक्स कलेक्टरों के भारी कर उत्पीड़न के खिलाफ संचालित किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से कथन पूर्णतः सत्य है/हैं?
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