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Indian Polity
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वित्तीय आपातकाल किस अनुच्छेद में है?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
अनुच्छेद 360 वित्तीय आपातकाल है।
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक उपबंधों, शक्तियों और उनके उत्तरदायित्वों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अंतर्गत नियुक्त भारत के महान्यायवादी को देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, तथा उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों और किसी भी समिति में जिसमें उसे सदस्य के रूप में नामित किया गया हो, बोलने और उसकी कार्यवाही में भाग लेने का पूर्ण अधिकार है, किंतु उसे किसी भी परिस्थिति में मतदान (Voting) करने का अधिकार प्राप्त नहीं है।
2. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) न केवल भारत की संचित निधि से किए जाने वाले सभी खर्चों की लेखापरीक्षा करता है, बल्कि वह केंद्र और राज्यों के निगमों, सरकारी कंपनियों और उन निकायों की भी लेखापरीक्षा करता है जिन्हें सरकार द्वारा पर्याप्त वित्तीय अनुदान प्राप्त होता है, किंतु सीएजी की रिपोर्टें सीधे संसद या राज्य विधानसभा में प्रस्तुत नहीं की जाती हैं, बल्कि उन्हें पहले राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है जो उन्हें सदन के पटल पर रखवाते हैं।
3. अनुच्छेद 148 के अनुसार नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को उसके पद से केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, तथा सीएजी अपनी पदवधि की समाप्ति के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के लाभ के पद (Office of Profit) या अन्य कार्यालय (Employment) के पात्र नहीं होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) की स्वतंत्रता, कार्यप्रणाली और चुनाव सुधारों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग एक स्थायी निकाय है, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, किंतु 1993 के पश्चात से चुनाव आयोग द्वारा लिए जाने वाले निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं, जिसमें CEC और अन्य ECs के पास समान शक्तियां होती हैं।
2. निर्वाचन आयोग के सदस्यों की सेवा शर्तें और पदावधि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती हैं, और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की होती है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की लिखित सिफारिश के बिना राष्ट्रपति द्वारा किसी भी परिस्थिति में नहीं हटाया जा सकता।
3. चुनाव सुधारों से संबंधित 'इंद्रजीत गुप्त समिति' (1998) ने लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए राज्य द्वारा वित्तीय सहायता (State Funding of Elections) के सिद्धांत का समर्थन किया था, बशर्ते यह सहायता केवल पंजीकृत राजनीतिक दलों को उनके चुनाव प्रदर्शन के आधार पर वस्तु के रूप में (in kind) दी जाए, न कि नगद रूप में।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत के महान्यायवादी (Attorney General for India) और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) के संवैधानिक उपबंधों, शक्तियों और उनकी कार्यप्रणाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, किंतु महान्यायवादी के पद के लिए यह अनिवार्य नहीं है कि वह उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने की अर्हता रखता हो, बल्कि उसके पास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पांच वर्ष का अनुभव या उच्च न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में दस वर्ष का अनुभव होना आवश्यक है।
2. भारत का महान्यायवादी न केवल भारत सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार होता है, बल्कि उसे देश के किसी भी न्यायालय में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, साथ ही उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने और भाग लेने का अधिकार भी प्राप्त है, किंतु वह संविधान के अनुच्छेद 88 के अंतर्गत संसदीय बैठकों में अपने मत (Voting) के अधिकार का प्रयोग कर सकता है यदि सरकार द्वारा ऐसा विशेष निर्देश दिया जाए।
3. संविधान के अनुच्छेद 148 के अंतर्गत नियुक्त नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) को उसके पद से उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, तथा सीएजी अपनी पदवधि की समाप्ति के पश्चात भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी भी प्रकार के कार्यालय (Employment) के पात्र नहीं होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय संविधान के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति की विधायी, कार्यपालिका और क्षमादान शक्तियों (Pardoning Powers) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी भी ऐसे मामले में, जिसमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय से संबंधित है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंड के मामले में तथा मृत्युदंड (Death Sentence) के मामले में क्षमा, प्रवિલंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है, और राष्ट्रपति की यह क्षमादान शक्ति राज्यपाल की तुलना में अधिक विस्तृत है क्योंकि राज्यपाल को मृत्युदंड के मामलों में क्षमादान की शक्ति प्राप्त नहीं है।
2. संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश प्रख्यापित करने की जो शक्ति प्राप्त है, वह उसकी स्वविवेक की शक्ति (Discretionary Power) है, जिसका प्रयोग वह प्रधानमंत्री या मंत्रिपरिषद के परामर्श के बिना अपनी स्वतंत्र इच्छा से कर सकता है, बशर्ते संसद के दोनों सत्र न चल रहे हों।
3. जब कोई साधारण विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति के पास उसकी अनुमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 111 के अंतर्गत विधेयक पर अपनी अनुमति रोक सकता है (अत्यधिक वीटो) या उसे पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है, किंतु यदि संसद उस विधेयक को संशोधन के साथ या बिना संशोधन के पुनः पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को उस पर अनुमति देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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राज्य विधानमंडल के अंतर्गत विधानसभा (Legislative Assembly) और विधान परिषद (Legislative Council) की विधायी शक्तियों, विशेषकर साधारण विधेयकों और धन विधेयकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 197 के अनुसार, यदि विधान परिषद किसी साधारण विधेयक को अस्वीकार कर देती है या ऐसे संशोधन करती है जिससे विधानसभा सहमत नहीं है, तो विधानसभा उस विधेयक को दोबारा पारित करके विधान परिषद के पास भेज सकती है; इसके पश्चात यदि विधान परिषद उस विधेयक को तीन मास तक और रोक रखती है, या विधेयक पर ऐसा अंतिम निर्णय लेती है जिससे विधानसभा असहमत है, तो विधेयक दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित हुआ माना जाएगा जिस रूप में वह विधान परिषद द्वारा दूसरी बार पारित किए जाने से पूर्व विधानसभा द्वारा पारित किया गया था, बशर्ते इस प्रक्रिया में संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान राज्य विधानमंडल में लागू न होता हो।
2. धन विधेयकों (Money Bills) के मामले में विधान परिषद को किसी भी प्रकार की संशोधन या अस्वीकृति की शक्ति प्राप्त नहीं है; विधान परिषद किसी धन विधेयक को अपने पास अधिकतम चौदह दिन की अवधि तक ही रोक सकती है, और यदि वह इस अवधि के भीतर विधेयक को वापस नहीं करती है, तो वह दोनों सदनों द्वारा उसी रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में वह विधानसभा द्वारा पारित किया गया था, तथा इस अवधि के दौरान यदि विधान परिषद विधेयक में कोई संशोधन सुझाती है, तो विधानसभा के लिए उन संशोधनों को स्वीकार करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य होता है।
3. राज्य के बजट (वार्षिक वित्तीय विवरण) के अंतर्गत अनुदान की मांगों (Demands for Grants) पर मतदान करने की शक्ति केवल विधानसभा को ही प्राप्त है, क्योंकि विधान परिषद को अनुदान मांगों पर चर्चा करने का अधिकार तो है, किंतु वह किसी भी अनुदान मांग पर मतदान (Voting on Demands for Grants) में भाग नहीं ले सकती है।
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