त्वरित लिंक्स
Civil services
5 views
भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' (Quit India Movement) और उससे जुड़े समानांतर सरकारों (Parallel Governments) के गठन के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र और प्रशासनिक विद्रोह के रूप में कई 'समानांतर सरकारों' (Parallel Governments) की स्थापना की गई थी, जिनमें बलिया (उत्तर प्रदेश) में चित्तू पांडेय के नेतृत्व में, तामलुक (बंगाल) में 'जातीय सरकार' के रूप में और सतारा (महाराष्ट्र) में 'प्रति सरकार' के रूप में सबसे दीर्घकालिक सरकार स्थापित हुई थी।
- 2. तामलुक की 'जातीय सरकार' के अंतर्गत सशस्त्र स्वयंसेवकों की एक वाहिनी का गठन किया गया था जिसे 'विद्या वाहिनी' कहा जाता था, और इस सरकार ने चक्रवात पीड़ितों के लिए राहत कार्य करने के साथ-साथ अपनी स्वयं की न्यायपालिका और प्रशासनिक व्यवस्था भी संचालित की थी।
- 3. सतारा की 'प्रति सरकार' (Prati Sarkar) का नेतृत्व नाना पाटिल और चव्हाण बंधुओं द्वारा किया गया था, और यह इस आंदोलन के दौरान स्थापित होने वाली सभी समानांतर सरकारों में सबसे अधिक समय तक (वर्ष 1945 के मध्य तक) सक्रिय रही, जिसने भूमिगत पत्रिकाओं और 'न्यायदान मंडलों' के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वशासन स्थापित किया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
भारत छोड़ो आंदोलन (8 अगस्त 1942) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक मोड़ था। गांधीजी के 'करो या मरो' (Do or Die) के आह्वान के बाद देशव्यापी दमन के बीच जनता ने स्वतःस्फूर्त नेतृत्व संभाला। इस दौरान देश के कई हिस्सों में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंककर 'समानांतर सरकारों' (Parallel Governments) की स्थापना की गई, जो इस आंदोलन की सबसे अनूठी विशेषता थी।
कथन 1 सही है: बलिया (उत्तर प्रदेश) में अगस्त 1942 के शुरुआती दिनों में चित्तू पांडेय के नेतृत्व में पहली समानांतर सरकार बनी, हालाँकि यह अल्पकालिक थी। पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के तामलुक उप-मंडल में 'जातीय सरकार' और महाराष्ट्र के सतारा में 'प्रति सरकार' स्थापित की गई।
कथन 2 सही है: तामलुक की 'जातीय सरकार' (मिदनापुर, बंगाल) ने तूफान और चक्रवात पीड़ितों की सहायता के लिए राहत कार्यों का संचालन किया तथा अपनी स्वयं की 'विद्या वाहिनी' और 'वाहिनी वाहिनी' जैसी स्वैच्छिक वाहिनी व न्याय प्रणाली स्थापित की।
कथन 3 सही है: सतारा (महाराष्ट्र) की 'प्रति सरकार' का नेतृत्व नाना पाटिल, अच्युत पटवर्धन और वाई.बी. चव्हाण जैसे नेताओं ने किया था। यह समानांतर सरकारों में सबसे दीर्घकालिक थी जो 1945 तक सक्रिय रही। इसने 'गांधी विवाह', नशबंदी और भूमिगत अदालतों ('न्यायदान मंडल') के माध्यम से समानांतर न्याय व्यवस्था चलाई। अतः तीनों कथन पूर्णतः सत्य हैं।
Related Questions
→
धन विधेयक का उल्लेख भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद में है?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IX' (पंचायती राज - अनुच्छेद 243 से 243-O) तथा 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 देश में त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (ग्राम स्तर, मध्यवर्ती स्तर और जिला स्तर) की स्थापना करता है, किंतु जिन राज्यों की जनसंख्या 20 लाख से कम है, उन्हें मध्यवर्ती स्तर पर पंचायत का गठन न करने की छूट प्रदान की गई है।
2. पंचायतों के सभी स्तरों पर सीटों के आरक्षण के संदर्भ में, अधिनियम के तहत प्रत्येक पंचायत में प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाने वाले कुल स्थानों का कम-से-कम एक-तिहाई भाग महिलाओं के लिए आरक्षित होना अनिवार्य किया गया है, जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल हैं।
3. प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक के लिए नियत तारीख से पांच वर्ष का होता है, और यदि किसी राज्य में पंचायत को समय से पूर्व विघटित (Dissolve) कर दिया जाता है, तो विघटन की तिथि से छह महीने की अवधि समाप्त होने से पहले नए चुनाव कराना अनिवार्य है, तथा शेष बची हुई अवधि के लिए गठित नई पंचायत केवल उसी शेष अवधि तक ही कार्य करेगी न कि पूरे पांच साल के लिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) तथा 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की क्षमादान की शक्तियों के बीच अंतर और उनकी सीमाओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का विस्तार उन सभी मामलों पर है जहाँ दंड या दंडादेश ऐसे विषय संबंधी किसी विधि के विरुद्ध दिया गया है जिस विषय तक संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, और इसमें 'कोर्ट मार्शल' (Court Martial) द्वारा दिए गए सभी मामलों के दंड शामिल हैं, साथ ही यह मृत्युदंड के पूर्ण क्षमादान तक विस्तारित है।
2. अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को भी किसी न्यायालय द्वारा दी गई सजा को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु राज्यपाल के पास 'मृत्युदंड' (Death Sentence) को पूरी तरह से माफ करने या क्षमा करने की संवैधानिक शक्ति नहीं है, भले ही संबंधित राज्य के कानून में मृत्युदंड का प्रावधान क्यों न हो।
3. 'महिपाल सिंह बनाम राजस्थान राज्य (2013)' और अन्य न्यायिक निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा क्षमादान की शक्ति का प्रयोग कोई विशुद्ध रूप से अनियंत्रित या विवेकाधीन राजनीतिक विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि यह मंत्रिपरिषद की सलाह के अधीन है और इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) इस आधार पर की जा सकती है कि यह शक्ति दुर्भावनापूर्ण, मनमाने ढंग से या प्रासंगिक तथ्यों को नजरअंदाज करके तो नहीं उपयोग की गई है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल कौन थे?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' (मूल अधिकार - अनुच्छेद 12 से 35) के अंतर्गत प्रदत्त 'समानता के अधिकार' (अनुच्छेद 14-18) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समता (Equality before law) और विधियों के समान संरक्षण (Equal protection of the laws) दोनों की गारंटी देता है, जिसमें 'विधि के समक्ष समता' की अवधारणा ब्रिटिश मूल की है और इसका अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति के पक्ष में विशिष्ट विशेषाधिकारों का अभाव, जबकि 'विधियों के समान संरक्षण' का विचार अमेरिकी संविधान से लिया गया है जिसका तात्पर्य समान परिस्थितियों वाले व्यक्तियों के बीच समान व्यवहार से है।
2. संविधान का अनुच्छेद 15 राज्य को किसी भी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के भी आधार पर कोई भेदभाव करने से रोकता है, और इसके अंतर्गत राज्य को यह शक्ति भी प्राप्त है कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए नागरिकों के वर्गों की उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष उपबंध (जैसे शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के लिए आरक्षण) बना सके, भले ही वे संस्थाएं निजी हों, अनुदानित हों या गैर-अनुदानित (अल्पसंख्यक संस्थाओं को छोड़कर)।
3. संविधान का अनुच्छेद 18 राज्य को सेना या विद्या संबंधी सम्मान के सिवाय अन्य कोई भी उपाधि प्रदान करने से रोकता है, तथा भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेशी राज्य से बिना राष्ट्रपति की सहमति के कोई भी उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता है, किंतु यदि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं है और वह भारत सरकार के अधीन किसी लाभ या विश्वास के पद को धारण करता है, तो वह राष्ट्रपति की सहमति के बिना किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि प्राप्त कर सकता है।
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.