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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XII' के अंतर्गत 'वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद' (अनुच्छेद 264 से 300क) तथा कर-आरोपण की विधायी शक्ति के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 265 के अनुसार किसी भी कर (Tax) को विधि के प्राधिकार (Authority of law) के बिना न तो अधिरोपित किया जा सकता है और न ही एकत्र किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि यह संरक्षण केवल कार्यपालिका के विरुद्ध उपलब्ध है और राज्य का विधानमंडल भी पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव से कर आरोपित नहीं कर सकता है।
- 2. संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची में विभिन्न करों को आरोपित करने की स्पष्ट शक्तियाँ दी गई हैं, किंतु 'वस्तु एवं सेवा कर' (GST) से संबंधित विशेष प्रावधानों के तहत संसद और किसी भी राज्य के विधानमंडल को समवर्ती सूची के अंतर्गत GST से जुड़े विषयों पर कानून बनाने की अनन्य शक्ति 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 द्वारा प्रदान की गई है।
- 3. संविधान के अनुच्छेद 300क के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से विधि के प्राधिकार के बिना वंचित नहीं किया जाएगा, और संपत्ति का अधिकार अब एक संवैधानिक अधिकार होने के साथ-साथ अनुच्छेद 300क के तहत एक विधिक अधिकार भी है, जिसके उल्लंघन पर सीधे अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है: अनुच्छेद 265 के अनुसार कोई भी कर विधि के प्राधिकार के बिना न तो लगाया जाएगा और न ही एकत्र किया जाएगा। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय के कई निर्णयों के अनुसार, विधायिका (संसद या राज्य विधानमंडल) को यह शक्ति प्राप्त है कि वह पूर्वव्यापी (Retrospective) प्रभाव से भी कर आरोपित कर सकती है, बशर्ते वह अन्य संवैधानिक प्रावधानों (जैसे अनुच्छेद 14 या 19) का उल्लंघन न करता हो। कथन 2 असत्य है: 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 द्वारा संविधान के अनुच्छेद 246क को अंतःस्थापित किया गया है, जिसके तहत संसद को अंतर-राज्यीय व्यापार या वाणिज्य के दौरान माल या सेवाओं की आपूर्ति पर GST लगाने की अनन्य शक्ति है, तथा संसद और राज्य विधानमंडलों दोनों को किसी अन्य वस्तु या सेवा पर GST लगाने की समवर्ती शक्ति दी गई है, लेकिन यह समवर्ती सूची में नहीं बल्कि एक विशिष्ट संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 246क) के अंतर्गत है। कथन 3 असत्य है: यद्यपि अनुच्छेद 300क के तहत संपत्ति का अधिकार एक संवैधानिक और विधिक अधिकार है, किंतु यह अब 'मूल अधिकार' (Fundamental Right) नहीं रहा है। इसलिए, इसके उल्लंघन पर सीधे अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दाखिल नहीं की जा सकती है, बल्कि इसके लिए उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 226 के तहत या सामान्य सिविल न्यायालय की शरण ली जाती है। अतः कोई भी कथन सही नहीं है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVIII' (आपात उपबंध - अनुच्छेद 352 से 360) के अंतर्गत 'राष्ट्रीय आपातकाल' (National Emergency) के उद्घोषणा और उसके प्रभावों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 352 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा केवल तभी की जा सकती है जब मंत्रिमंडल (Cabinet) द्वारा इस आशय का लिखित विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित किया जाए, और यह उद्घोषणा संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तिथि से एक महीने के भीतर विशेष बहुमत द्वारा अनुमोदित होना अनिवार्य है।
2. राष्ट्रीय आपातकाल के प्रवृत्त होने पर संविधान के अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त सभी छह मूल अधिकार स्वतः ही निलंबित हो जाते हैं, और इसके लिए राष्ट्रपति द्वारा किसी अलग से आदेश जारी करने की आवश्यकता नहीं होती है, तथा आपातकाल समाप्त होने के तुरंत बाद ये अधिकार पुनर्जीवित हो जाते हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 359 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह आदेश द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भाग III द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों (अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर) के प्रवर्तन को किसी न्यायालय में निलंबित कर सकता है, किंतु ऐसा आदेश संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग तक ही सीमित हो सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XV' (निर्वाचन - अनुच्छेद 324 से 329क) तथा 'भारत निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) के अतिरिक्त अन्य संवैधानिक निकायों एवं निर्वाचन सुधारों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे, जिसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है, उसे मतदान का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है और किसी भी व्यक्ति को केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर निर्वाचक नामावली में सम्मिलित किए जाने के लिए अपात्र घोषित नहीं किया जा सकता है।
2. संविधान के अनुच्छेद 327 के तहत संसद को यह अनन्य शक्ति प्राप्त है कि वह समय-समय पर विधि द्वारा संसदों और राज्य के विधानमंडलों के निर्वाचनों से संबंधित सभी मामलों (जिनमें मतदाता सूचियों की तैयारी, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन और निर्वाचन के संचालन से जुड़े सभी अन्य विषय शामिल हैं) के संबंध में उपबंध कर सकती है।
3. 'परिसीमन आयोग अधिनियम' के अंतर्गत गठित परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) के आदेशों को देश के किसी भी न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है, यदि वह आदेश संसद द्वारा निर्धारित नियमों या संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करता हो, क्योंकि भारत में कोई भी वैधानिक निकाय न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IXख' (सहकारी समितियाँ - अनुच्छेद 243ZH से 243ZT) के अंतर्गत सहकारी समितियों के गठन, संचालन और उनके प्रावधानों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान (97वाँ संशोधन) अधिनियम, 2011 द्वारा सहकारी समितियों के गठन के अधिकार को अनुच्छेद 19(1)(c) के तहत एक मूल अधिकार बनाया गया, तथा 'भाग IXख' को अंतःस्थापित करके सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज और लोकतांत्रिक नियंत्रण को संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया।
2. संविधान के अनुच्छेद 243ZK के अनुसार किसी सहकारी समिति के बोर्ड के निदेशकों का निर्वाचन उस स्थिति में पाँच वर्ष की अवधि समाप्त होने से पहले कराया जाएगा, और यदि किसी सहकारी समिति के बोर्ड का किसी कारणवश अधिक्रमण (Supersession) या निलंबन किया जाता है, तो उसके विघटन की तिथि से अधिकतम छह महीने की अवधि के भीतर नए बोर्ड के गठन के लिए चुनाव कराना अनिवार्य होगा।
3. संविधान के अनुच्छेद 243ZF के प्रावधान के अनुसार किसी राज्य का विधानमंडल सहकारी समितियों से संबंधित कोई भी कानून बना सकता है, किंतु 97वें संविधान संशोधन अधिनियम के लागू होने की तिथि से पूर्व प्रवृत्त कोई भी राज्य सहकारी कानून यदि इस नए भाग के उपबंधों के असंगत है, तो वह स्वतः ही तुरंत शून्य (Void) हो जाएगा, बिना किसी राज्य विधायिका के संशोधन के।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IV' के अंतर्गत 'राज्य के नीति निर्देशक तत्व' (Directive Principles of State Policy - DPSP - अनुच्छेद 36 से 51) तथा उनकी न्यायसंगतता के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 37 के अनुसार DPSP देश के शासन में मौलिक हैं और देश के लिए कानून बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा, किंतु ये तत्व किसी भी न्यायालय द्वारा न्यायसंगत (Justiciable) नहीं हैं, अर्थात इन्हें किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता है।
2. संविधान में यद्यपि DPSP को गैर-न्यायसंगत बनाया गया है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे मिनर्वा मिल्स वाद, 1980) में यह प्रतिपादित किया है कि मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों के बीच संतुलन संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का एक अनिवार्य हिस्सा है, और नीति निर्देशक तत्वों के क्रियान्वयन के लिए बनाए गए कानून को अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19 के उल्लंघन के आधार पर पूरी तरह असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता यदि वह अनुच्छेद 39(b) या (c) के उद्देश्यों को पूरा करता हो।
3. संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत 'समान नागरिक संहिता' (Uniform Civil Code) का प्रावधान एक ऐसा नीति निर्देशक तत्व है जिसे केवल संसद द्वारा ही पूरे देश के लिए एक साथ अधिनियमित किया जा सकता है, और किसी भी राज्य के विधानमंडल को अपने राज्य क्षेत्र के भीतर समान नागरिक संहिता से संबंधित कोई भी कानून बनाने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है।
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हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
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