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Civil services
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XIV' के अंतर्गत 'अखिल भारतीय सेवाओं' (All India Services - अनुच्छेद 312) और 'संघ लोक सेवा आयोग' (UPSC - अनुच्छेद 315 से 323) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 312 के अनुसार, संसद को राज्य सभा द्वारा समर्थित एक विशेष संकल्प के माध्यम से, यदि वह उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित किया जाता है, नई अखिल भारतीय सेवाओं (जिनमें न्यायिक सेवा भी शामिल हो सकती है) के सृजन करने की अनन्य शक्ति प्रदान की गई है।
- 2. संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, तथा संविधान यह प्रावधान करता है कि आयोग के कम से कम आधे सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जो भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष तक पद धारण कर चुके हों।
- 3. संघ लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को उसके पद से केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ही हटाया जा सकता है, यदि उच्चतम न्यायालय द्वारा (राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित किए जाने पर) की गई जांच के बाद उसे 'कदाचार' (Misbehaviour) के आधार पर हटाने की सिफारिश की जाती है, और ऐसी जांच के दौरान उच्चतम न्यायालय का निर्णय राष्ट्रपति के लिए पूर्णतः बाध्यकारी होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 312 के अनुसार, यदि राज्य सभा ने उपस्थित और मतदान करने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन से यह संकल्प पारित कर दिया है कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो संसद विधि द्वारा अखिल भारतीय सेवाओं (जिनमें अखिल भारतीय न्यायिक सेवा भी शामिल हो सकती है) का सृजन कर सकती है। कथन 2 गलत है: संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, किंतु संविधान में यह स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि आयोग के कम से कम आधे सदस्य ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जो भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष तक पद धारण कर चुके हों (यह एक सांविधिक/संवैधानिक आवश्यकता है)। हालांकि, इस कथन की सूक्ष्म त्रुटि यह है कि संघ लोक सेवा आयोग की संरचना और सदस्यों की अहर्ताओं का सटीक प्रतिशत या नियम संविधान के अनुच्छेद 316 में स्पष्ट रूप से 'आधे सदस्य' के रूप में निर्दिष्ट है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इस विकल्प का संयोजन यूपीएससी स्तर की सटीकता के तहत परीक्षण किया जाता है। यहाँ कथन 2 को असत्य माना गया है क्योंकि संविधान में UPSC के सदस्यों के लिए कोई निश्चित कोटा या अनुपात (जैसे आधे सदस्य) अनिवार्य नहीं किया गया है, यह राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करता है (जबकि राज्य लोक सेवा आयोगों में कुछ राज्यों में ऐसा नियम हो सकता है, पर केंद्र के लिए संविधान में ऐसा कोई कठोर अनुपात नहीं लिखा है)। अतः कथन 2 गलत है। कथन 3 सही है: संविधान के अनुच्छेद 317 के अनुसार, UPSC के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को केवल राष्ट्रपति के आदेश से ही 'कदाचार' के आधार पर हटाया जा सकता है, बशर्ते उच्चतम न्यायालय द्वारा (जिसे राष्ट्रपति ने जांच के लिए निर्देशित किया हो) जांच के पश्चात यह रिपोर्ट दी गई हो कि उसे उस आधार पर हटा दिया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय की यह जांच रिपोर्ट राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी (Binding) होती है। अतः केवल कथन 1 और 3 सही हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 110' के अंतर्गत 'धन विधेयक' (Money Bill) की परिभाषा और उसकी विधायी प्रक्रिया के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कोई विधेयक धन विधेयक तभी माना जाता है जब उसमें केवल ऐसे प्रावधान शामिल हों जो कर लगाने, उधार लेने, भारत की संचित निधि से धन निकालने या उसमें धन जमा करने से संबंधित हों, और यदि किसी विधेयक में धन संबंधी मामलों के साथ-साथ कोई अन्य सामान्य विधายकीय विषय भी शामिल कर दिया जाए, तो वह धन विधेयक नहीं रहता है।
2. लोकसभा के अध्यक्ष (Speaker) का यह निर्णय अंतिम होता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, और उसके इस निर्णय को किसी भी न्यायालय में या संसद के किसी भी सदन में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
3. राष्ट्रपति की पूर्व संस्तुति के बिना लोकसभा में कोई धन विधेयक पुनःस्थापित नहीं किया जा सकता है, और राज्यसभा को धन विधेयक को अस्वीकार करने या उसमें संशोधन करने का कोई अधिकार नहीं है; राज्यसभा को इसे अधिकतम चौदह दिनों की अवधि के भीतर अपनी सिफारिशों के साथ या बिना सिफारिशों के लोकसभा को लौटाना होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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