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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत' (Plate Tectonics Theory) और पृथ्वी के स्थलीय रूपों के निर्माण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार, पृथ्वी का स्थलमंडल (Lithosphere) कई कठोर खंडों में विभाजित है जिन्हें विवर्तनिकी प्लेटें कहा जाता है, और ये प्लेटें दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) पर तैरती रहती हैं।
- 2. अभिसारी सीमाएँ (Convergent Boundaries) वे क्षेत्र हैं जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप नई महासागरीय पपड़ी (Oceanic Crust) का निर्माण होता है, जिसे 'रचनात्मक प्लेट सीमा' भी कहा जाता है।
- 3. जब एक महासागरीय प्लेट और एक महाद्वीपीय प्लेट आपस में टकराती हैं, तो अपेक्षाकृत भारी और घनी महासागरीय प्लेट महाद्वीपीय प्लेट के नीचे क्षेपित (Subduct) हो जाती है, जिससे महाद्वीपीय किनारे पर गहरी खाइयों (Trenches) और वलित पर्वतों (Fold Mountains) का निर्माण होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: पृथ्वी का स्थलमंडल (जो क्रस्ट और ऊपरी मेंटल का ठोस हिस्सा है) अनेक टुकड़ों में विभाजित है जिन्हें 'विवर्तनिकी प्लेटें' (Tectonic Plates) कहा जाता है। ये प्लेटें अंसिंचित या अर्द्ध-पिघली हुई अवस्था वाले दुर्बलतामंडल (Asthenosphere) के ऊपर धीमी गति से गति करती हैं।
कथन 2 गलत है: जिन सीमाओं पर दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर जाती हैं, उन्हें 'अपसारी सीमाएँ' (Divergent Boundaries) कहा जाता है, न कि अभिसारी सीमाएँ। अपसारी सीमाओं (जैसे मध्य-महासागरीय कछार) पर नई महासागरीय पपड़ी का निर्माण होता है, इसलिए इन्हें 'रचनात्मक प्लेट सीमा' कहा जाता है। इसके विपरीत, अभिसारी सीमाओं पर प्लेटें एक-दूसरे के पास आती हैं और यहाँ पपड़ी का विनाश होता है।
कथन 3 सही है: अभिसारी सीमाओं के अंतर्गत जब एक भारी महासागरीय प्लेट किसी हल्की महाद्वीपीय प्लेट से टकराती है, तो भारी प्लेट का घनत्व अधिक होने के कारण वह महाद्वीपीय प्लेट के नीचे धंस जाती है (क्षेपण या Subduction)। इस प्रक्रिया से महाद्वीपीय हाशिये पर गहरी महासागरीय खाइयाँ (Trenches), द्वीप चाप और वलित पर्वतों (जैसे एंडीज पर्वतमाला) का निर्माण होता है।
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन…
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVII' (राजभाषा - अनुच्छेद 343 से 351) और उससे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार, संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, तथा इसके अतिरिक्त अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप (International form of Indian numerals) होगा, किंतु संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह विधि द्वारा पंद्रह वर्ष की अवधि (1965 तक) के बाद भी सरकारी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा के निरंतर प्रयोग को प्राधिकृत कर सके।
2. संविधान की 'आठवीं अनुसूची' में मूल रूप से चौदह भाषाएँ शामिल थीं, जिन्हें बाद में विभिन्न संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से बढ़ाया गया, जिसके तहत वर्ष 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली भाषाओं को शामिल किए जाने के पश्चात वर्तमान में इस अनुसूची में कुल 22 भाषाएँ मान्यता प्राप्त हैं।
3. संविधान के अनुच्छेद 351 के अनुसार, यह संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति (Composite culture) के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके, और इसके विकास के लिए उसे अन्य भारतीय भाषाओं - विशेष रूप से संस्कृत से - शब्दावली ग्रहण करने का निर्देश दिया गया है, न कि किसी अन्य विदेशी भाषा से।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVI' (कुछ वर्गों के संबंध में विशेष उपबंध - अनुच्छेद 330 से 342क) के अंतर्गत अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (SEBC) से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 के अनुसार, लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण उनकी जनसंख्या के अनुपात में किया जाता है, तथा 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2018 द्वारा इस आरक्षण की अवधि को बढ़ाकर वर्ष 2030 तक कर दिया गया है।
2. संविधान के अनुच्छेद 338क के तहत गठित 'राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग' (NCST) के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा शर्तों और पदावधि का निर्धारण करने की शक्ति संसद के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास।
3. संविधान के अनुच्छेद 342क के अनुसार, राष्ट्रपति किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, राज्यपाल (या उस राज्य के प्रशासक) से परामर्श करने के पश्चात्, लोक अधिसूचना द्वारा उन सामाजिक और शैक्षणिक जातियों को निर्दिष्ट कर सकता है जिन्हें उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में 'सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग' (SEBC) माना जाएगा, तथा किसी जाति को इस सूची में जोड़ने या हटाने की अंतिम शक्ति केवल संसद में निहित है, राष्ट्रपति में नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'पृथ्वी की आंतरिक संरचना' (Interior of the Earth) और भूकम्पीय तरंगों (Seismic Waves) के व्यवहार से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भूकम्पीय तरंगों में प्राथमिक तरंगें (P-waves) ध्वनि तरंगों की भाँति अनुदैर्ध्य (Longitudinal) तरंगें होती हैं जो ठोस, तरल और गैस तीनों माध्यमों से गुजर सकती हैं, जबकि द्वितीयक तरंगें (S-waves) प्रकाश तरंगों की भाँति अनुप्रस्थ (Transverse) तरंगें होती हैं जो केवल ठोस माध्यमों से ही गुजर सकती हैं और तरल माध्यम में लुप्त हो जाती हैं।
2. पृथ्वी के क्रोड (Core) के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि इसका बाहरी क्रोड (Outer Core) तरल अवस्था में है क्योंकि वहाँ P-तरंगों की गति अत्यधिक बढ़ जाती है और S-तरंगों का संचरण रुक जाता है, जबकि आंतरिक क्रोड (Inner Core) अत्यधिक दबाव के कारण ठोस अवस्था में पाया जाता है।
3. पृथ्वी की पपड़ी (Crust) और ऊपरी मेंटल के सबसे ऊपरी ठोस हिस्से को मिलाकर 'स्थलमंडल' (Lithosphere) कहा जाता है, जिसकी औसत मोटाई महाद्वीपों के नीचे सबसे कम और महासागरों के नीचे सबसे अधिक होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1930 के 'सविनय अवज्ञा आंदोलन' (Civil Disobedience Movement) और उससे जुड़े घटनाक्रमों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी द्वारा प्रसिद्ध 'दांडी मार्च' (Salt March) के साथ की गई थी, जिसके तहत साबरमती आश्रम से दांडी तक की 240 मील की यात्रा कर 6 अप्रैल 1930 को सांकेतिक रूप से नमक कानून तोड़ा गया, तथा इस दौरान चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने तमिलनाडु में वेदारण्यम नमक सत्याग्रह का नेतृत्व किया था।
2. इस आंदोलन के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में प्रतिरोध देखा गया, जिसके तहत उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में 'खुदाई खिदमतगार' (Khudai Khidmatgar) नामक संगठन ने सक्रिय भूमिका निभाई, जिन्हें 'लाल कुर्ती' (Red Shirts) आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है।
3. सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रथम चरण के दौरान ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने लार्ड इरविन के साथ हुए 'गांधी-इरविन समझौते' (Gandhi-Irwin Pact) के तहत वर्ष 1931 में लंदन में आयोजित होने वाले तीनों (प्रथम, द्वितीय और तृतीय) गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने की सैद्धांतिक सहमति दी थी और कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में महात्मा गांधी ने सभी सम्मेलनों में व्यक्तिगत रूप से भाग लिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
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