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भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, मध्यकालीन भारत की 'भक्ति और सूफी परंपराओं' तथा उनके दार्शनिक आयामों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. दक्षिण भारत में उत्पन्न हुई भक्ति आंदोलन की धारा में अलवार (वैष्णव संत) और नयनार (शैव संत) संतों ने न केवल जातिगत और लैंगिक रूढ़ियों का कड़ा विरोध किया, बल्कि तमिल भाषा के प्रयोग को बढ़ावा देते हुए 'नालयिर दिव्य प्रबंधम' (Nalayira Divya Prabandham) जैसे ग्रंथों के माध्यम से भक्ति साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया।
- 2. सूफी सिलसिले (Sufi Orders) के अंतर्गत 'चिश्ती सिलसिला' भारत में सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ, जिसकी स्थापना ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने अजमेर में की थी, तथा इस सिलसिले के संतों ने राज्य के संरक्षण और शाही दरबारों से जुड़े रहना अनिवार्य माना ताकि वे राजनीतिक सत्ता के माध्यम से इस्लाम का प्रचार कर सकें।
- 3. विजयनगर साम्राज्य के प्रसिद्ध शासक कृष्णदेव राय के शासनकाल में तेलुगु साहित्य का 'प्रबंध काल' (Prabandha Period) स्वर्ण युग कहलाता था, और स्वयं कृष्णदेव राय ने 'अमुक्तमाल्यद' (Amuktamalyada) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की, जिसमें अलवार संत पेरियालवार की पुत्री गोदा (आण्डाळ) के विवाह और दर्शन का वर्णन है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: दक्षिण भारत में अलवार (वैष्णव) और नयनार (शैव) संतों ने भक्ति आंदोलन को लोकप्रिय बनाया। उन्होंने जाति व्यवस्था और लैंगिक भेदभाव का विरोध किया तथा स्थानीय तमिल भाषा में अपने विचार व्यक्त किए। अलवार संतों के भजनों का संकलन 'नालयिर दिव्य प्रबंधम' कहलाता है जिसे 'पाँचवाँ वेद' भी माना जाता है।
कथन 2 गलत है: चिश्ती सिलसिले के संतों ने राज्य के संरक्षण और शाही दरबारों से दूर रहने की नीति अपनाई थी। वे राजाओं या सुल्तानों के उपहारों और अनुदानों को स्वीकार करने से बचते थे तथा अपनी आजीविका के लिए सादा जीवन जीते और श्रम करते थे (जैसे शेख निजामुद्दीन औलिया)।
कथन 3 सही है: विजयनगर के तुलुव वंश के प्रतापी राजा कृष्णदेव राय (शासनकाल 1509–1529) के दरबार में 'अष्टदिग्गज' रहते थे। उनके द्वारा रचित तेलुगु ग्रंथ 'अमुक्तमाल्यद' वैष्णव संत पेरियालवार की पुत्री आण्डाळ (गोदा) के भगवान रंगनाथ के प्रति प्रेम और विवाह की कथा पर आधारित है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XX'…
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भारतीय इतिहास और राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में, वर्ष 1905…
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' के अंतर्गत प्रदत्त 'मूल अधिकारों' (Fundamental Rights) और उनके प्रवर्तन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 13 यह सुनिश्चित करता है कि राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा जो भाग III द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनता है या उनका अल्पीकरण करता है, और इस प्रयोजन के लिए 'विधि' (Law) शब्द के अंतर्गत केवल संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए अधिनियम (Acts) ही शामिल हैं, न कि अध्यादेश, उप-विधियाँ, नियम, या रूढ़ियाँ।
2. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट (Writs) जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और यह अधिकार स्वयं में एक मूल अधिकार है, जबकि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है जो उच्च न्यायालयों की न्यायक्षेत्रीय शक्ति का हिस्सा है न कि मूल अधिकार।
3. अनुच्छेद 33 संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह सशस्त्र बलों, अर्ध-सैनिक बलों, पुलिस बलों और खुफिया एजेंसियों के सदस्यों के मूल अधिकारों पर प्रतिबंध या उनका पूर्ण निरसन (Abrogation) कर सके ताकि उनके द्वारा अपने कर्तव्यों का उचित निर्वाह और अनुशासन सुनिश्चित किया जा सके, तथा ऐसी विधि बनाने की यह शक्ति केवल संसद के पास है, राज्य विधानमंडलों के पास नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' (संघ और राज्यों के बीच विधाई और प्रशासनिक संबंध - अनुच्छेद 245 से 263) के अंतर्गत विधाई संबंधों और शक्तियों के विभाजन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार, संसद को संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, और संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून को इस आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि उसका 'अति-क्षेत्रीय प्रभाव' (Extra-territorial operation) है।
2. संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची (सूची-I) में राष्ट्रीय महत्व के विषय शामिल हैं, राज्य सूची (सूची-II) में क्षेत्रीय महत्व के विषय शामिल हैं, और समवर्ती सूची (सूची-III) में ऐसे विषय हैं जिन पर संसद और राज्य विधानमंडल दोनों कानून बना सकते हैं, तथा यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद का कानून और राज्य का कानून एक-दूसरे के प्रतिकूल होते हैं, तो संसद का कानून हमेशा राज्य के कानून पर प्रभावी होगा, भले ही राज्य के कानून को राष्ट्रपति की अनुमति पहले से प्राप्त क्यों न हो।
3. संविधान के अनुच्छेद 249 के अंतर्गत, यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से एक प्रस्ताव पारित कर यह घोषित करती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक या expedient है कि संसद राज्य सूची में प्रयुक्त किसी विषय पर कानून बनाए, तो संसद को उस विषय पर संपूर्ण देश या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति मिल जाती है, और ऐसा प्रस्ताव अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'महासागरीय धाराओं' (Ocean Currents) और उनके निर्माण तथा जलवायु पर पड़ने वाले प्रभावों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महासागरीय धाराएँ महासागरों में जल का एक निश्चित दिशा में निरंतर प्रवाह है, जो मुख्य रूप से प्रचलित हवाओं (Prevailing winds), पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न कोरिओलिस बल (Coriolis force), तापमान और लवणता में भिन्नता के कारण जल के घनत्व में अंतर से प्रभावित होता है।
2. कोरिओलिस बल के प्रभाव के कारण, महासागरीय धाराएँ उत्तरी गोलार्ध में अपनी मूल दिशा से दाईं ओर (Clockwise/घड़ी की सुई की दिशा में) तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर (Anti-clockwise/घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में) विक्षेपित हो जाती हैं, जिसे 'फेरेल का नियम' भी कहा जाता है।
3. विश्व के सभी प्रमुख महासागरों के पश्चिमी तटों (महाद्वीपों के पूर्वी भागों में) ठंडी धाराएँ प्रवाहित होती हैं, जो मरुस्थलीकरण और शुष्क जलवायु के निर्माण में सहायक होती हैं, जबकि महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर गर्म धाराओं का प्रवाह होता है जो वहाँ अत्यधिक वर्षा का कारण बनती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'रामसर अभीसमय' (Ramsar Convention) और भारत में आर्द्रभूमियों (Wetlands) के संरक्षण से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रामसर अभीसमय आर्द्रभूमियों के संरक्षण और उनके विवेकपूर्ण उपयोग (Wise Use) के लिए वर्ष 1971 में ईरान के रामसर शहर में हस्ताक्षरित एक अंतर-सरकारी संधि है, जो आधिकारिक तौर पर वर्ष 1975 में लागू हुई थी, तथा भारत इस अभीसमय का एक हस्ताक्षरकर्ता देश है।
2. इस अभीसमय के तहत किसी आर्द्रभूमि को 'अंतर्राष्ट्रीय महत्व की रामसर साइट' (Ramsar Site of International Importance) के रूप में नामित करने के लिए, उस स्थल को 'मोंट्रेक्स रिकॉर्ड' (Montreux Record) में शामिल होना अनिवार्य है, क्योंकि मोंट्रेक्स रिकॉर्ड रामसर स्थलों की मुख्य सूची है जिसमें सभी वैश्विक आर्द्रभूमियां स्वचालित रूप से शामिल होती हैं।
3. भारत में वर्तमान में कुल रामसर स्थलों की संख्या में तमिलनाडु राज्य का स्थान प्रथम है, जहाँ देश के सबसे अधिक रामसर स्थल स्थित हैं, इसके बाद उत्तर प्रदेश का स्थान आता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
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