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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'भूकंपीय तरंगों' (Seismic Waves) और पृथ्वी के आंतरिक भाग की संरचना से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. भूकंप के दौरान उत्पन्न होने वाली प्राथमिक तरंगें (P-waves) अनुदैर्ध्य (Longitudinal) तरंगें होती हैं, जो ध्वनि तरंगों की तरह कार्य करती हैं और ठोस, तरल तथा गैस तीनों प्रकार के माध्यमों से गुजर सकती हैं, जबकि द्वितीयक तरंगें (S-waves) अनुप्रस्थ (Transverse) तरंगें होती हैं जो केवल ठोस माध्यमों से ही गुजर सकती हैं।
- 2. 'छाया क्षेत्र' (Shadow Zone) वह विशिष्ट क्षेत्र होता है जहाँ कोई भी भूकंपीय तरंग (न तो P-और न ही S-वेव्स) दर्ज नहीं की जाती है, और भूकंपीय अधिकेंद्र (Epicentre) से 105° से 145° के बीच का पूरा क्षेत्र दोनों प्रकार की तरंगों के लिए सार्वभौमिक छाया क्षेत्र के रूप में जाना जाता है।
- 3. पृथ्वी की आंतरिक संरचना में क्रोड (Core) के भीतर तरल बाहरी क्रोड (Outer Core) के कारण S-वेव्स का संचरण रुक जाता है, जिसके परिणामस्वरूप P-वेव्स का छाया क्षेत्र 105° से आगे विस्तृत होता है और यह तथ्य वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध करता है कि पृथ्वी का बाहरी क्रोड तरल अवस्था में है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: प्राथमिक तरंगें (P-waves) ध्वनि तरंगों की तरह अनुदैर्ध्य होती हैं और ये ठोस, तरल तथा गैस तीनों माध्यमों में चल सकती हैं। द्वितीयक तरंगें (S-waves) प्रकाश तरंगों की तरह अनुप्रस्थ होती हैं और ये केवल ठोस पदार्थों से ही गुजर सकती हैं, तरल पदार्थों में इनका संचरण नहीं होता है।
कथन 2 गलत है: भूकंपीय अधिकेंद्र (Epicentre) से 105° से 145° के बीच का क्षेत्र केवल 'P-वेव्स' के लिए छाया क्षेत्र होता है (यानी यहाँ P-वेव्स दर्ज नहीं होती हैं)। जबकि S-वेव्स का छाया क्षेत्र अधिकेंद्र से 105° से लेकर 180° (यानी 105° के बाद का पूरा विपरीत गोलार्ध) तक विस्तृत होता है, क्योंकि S-वेव्स तरल क्रोड को पार नहीं कर पाती हैं। इसलिए 'दोनों प्रकार की तरंगों के लिए 105° से 145° का क्षेत्र सार्वभौमिक छाया क्षेत्र है' यह कथन गलत है।
कथन 3 सही है: चूँकि S-वेव्स तरल बाहरी क्रोड में प्रवेश नहीं कर पाती हैं, इसलिए 105° के बाद S-वेव्स पूरी तरह गायब हो जाती हैं। वहीं P-वेव्स तरल माध्यम से गुजरने पर अपवर्तित (Refract) हो जाती हैं, जिससे 105° और 145° के बीच एक बैंड बनता है जहाँ P-वेव्स नहीं पहुँचती हैं (P-wave shadow zone)। यह साक्ष्य वैज्ञानिकों को यह निष्कर्ष निकालने में मदद करता है कि पृथ्वी का बाहरी क्रोड तरल अवस्था में है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVIII' के अंतर्गत 'आपात उपबंध' (Emergency Provisions - Articles 352-360) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के आधार पर की जा सकती है, तथा मूल संविधान में 'सश सशस्त्र विद्रोह' शब्द के स्थान पर 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द का प्रयोग किया गया था जिसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा बदला गया था।
2. अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन (President's Rule) की उद्घोषणा किसी राज्य में इस आधार पर की जा सकती है कि उस राज्य की सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चल रही है, और ऐसी उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा इसके जारी होने की तारीख से दो महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य होता है, जिसे विशेष बहुमत (Special Majority) द्वारा ही पारित किया जाना आवश्यक है।
3. अनुच्छेद 360 के अधीन वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency) की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जा सकती है जब उन्हें यह संतुष्टि हो जाए कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत या उसके किसी क्षेत्र की वित्तीय स्थिरता या साख को खतरा है, और वित्तीय आपातकाल की यह उद्घोषणा संसद के अनुमोदन के बिना एक बार लागू होने के बाद अनिश्चितकाल तक स्वतः प्रवृत्त रहती है जब तक कि राष्ट्रपति इसे वापस न ले लें।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XX' के अंतर्गत 'संविधान संशोधन' (Amendment of the Constitution - Article 368) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की पहल संसद के किसी भी सदन में एक विधेयक (Bill) को पुनःस्थापित करके की जा सकती है, और इस प्रयोजन के लिए ऐसा विधेयक प्रस्तुत करने से पूर्व राष्ट्रपति से पूर्व अनुमति (Prior permission) लेना अनिवार्य होता है।
2. संविधान के कुछ विशिष्ट उपबंधों, जैसे राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति या संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्तियों के विस्तार से संबंधित प्रावधानों में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत के साथ-साथ देश के कुल राज्यों के कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन (Ratification) प्राप्त होना आवश्यक है।
3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'केशवानंद भारती वाद' (1973) में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के अनुसार संसद को अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, बशर्ते वह संशोधन संविधान के 'आधारभूत ढांचे' (Basic Structure) का उल्लंघन न करे, तथा न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) इस आधारभूत ढांचे का एक अभिन्न अंग है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय इतिहास और मध्यकालीन प्रशासन के संदर्भ में, सल्तनत कालीन और मुगलकालीन राजस्व व्यवस्था तथा 'मंसबदारी प्रणाली' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मुगल सम्राट अकबर द्वारा आरम्भ की गई मंसबदारी प्रणाली में 'जात' और 'सवार' पद यह निर्धारित करते थे कि संबंधित मंसबदार का व्यक्तिगत दर्जा (पदानुक्रम) क्या है और उसे अपने सैन्य दल में कितने घोड़ों और घुड़सवार सैनिकों का रखरखाव करना होगा, तथा इस व्यवस्था की मूल प्रेरणा मंगोलों की सैन्य और प्रशासनिक संरचना (दशमलव प्रणाली) से ली गई थी।
2. सल्तनत काल के दौरान अलाउद्दीन खिलजी ने अपनी सैन्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 'हुलिया' (सैनिकों का वर्णनात्मक रिकॉर्ड) रखने और 'चेहरा व दाग' (घोड़ों को दागने) की प्रथा को सख्ती से लागू किया था, और कृषि भूमि पर सीधे कर निर्धारण के लिए उसने 'खराज' की दर को बढ़ाकर उपज का आधा (50 प्रतिशत) कर दिया था।
3. मुगल शासनकाल में 'मदद-ए-मामाश' (या सयूरगल) राज्य द्वारा विद्वानों, धार्मिक व्यक्तियों और जरूरतमंदों को दी जाने वाली कर-मुक्त भूमि अनुदान थी, जिसे वंशानुगत (Hereditary) रूप से किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जा सकता था और औरंगजेब के शासनकाल में इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था।
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भारतीय इतिहास और मध्यकालीन प्रशासन के संदर्भ में, 'दहसाल प्रणाली' (Dahshala System) या 'टोडरमल बंदोबस्त' (Todar Mal's Bandobast) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस प्रणाली को मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान उनके वित्त मंत्री राजा टोडरमल द्वारा वर्ष 1580 में पूर्ण रूप से लागू किया गया था, जो कि पिछले दस वर्षों (1570-1580) के दौरान विभिन्न फसलों के औसत उत्पादन और औसत बाजार कीमतों के आंकड़ों पर आधारित थी।
2. इस व्यवस्था के अंतर्गत भूमि को उसकी उर्वरता के आधार पर चार श्रेणियों - पोलज, परती, चाचर और बंजर - में वर्गीकृत किया गया था, जिसमें 'पोलज' वह भूमि थी जिस पर वर्ष में दो बार लगातार फसलें उगाई जाती थीं और इसे कभी भी खाली नहीं छोड़ा जाता था।
3. दहसाल प्रणाली भू-राजस्व निर्धारण की 'जब्ती प्रणाली' (Zabti System) का ही एक परिष्कृत रूप थी, जिसमें राजस्व का नकद भुगतान (Cash payment) अनिवार्य किया गया था, और इस व्यवस्था के लागू होने से साम्राज्य को कृषि आय की अनिश्चितता से मुक्ति मिली तथा राजकोषीय स्थिरता प्राप्त हुई।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
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