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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग V' के अंतर्गत 'संसद के विशेषाधिकारों' (Parliamentary Privileges) और 'अनुच्छेद 105' के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत संसद के प्रत्येक सदन को, उसके सदस्यों को और उसकी समितियों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं, जिनके तहत यदि संसद द्वारा अपने किसी विशेषाधिकार के हनन (Breach of privilege) या अवमानना (Contempt) के लिए किसी व्यक्ति को दंडित किया जाता है, तो उस संसदीय निर्णय या प्रक्रिया की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) किसी भी स्थिति में न्यायालय द्वारा नहीं की जा सकती है।
- 2. जब संसद का सत्र चल रहा हो, तो संसद के सदस्यों को सिविल मामलों में गिरफ्तारी से सदन के आरंभ होने से 40 दिन पूर्व और सदन की समाप्ति के 40 दिन बाद तक छूट प्राप्त होती है, किंतु यह उन्मुक्ति आपराधिक मामलों या निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के मामलों में लागू नहीं होती है।
- 3. भारत के संविधान में ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स (House of Commons) के विशेषाधिकारों को मूल रूप से भारतीय संसद के लिए संदर्भ के रूप में अपनाया गया था, किंतु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के पश्चात यह स्पष्ट कर दिया गया कि जब तक संसद अपने विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध (Codify) नहीं करती है, तब तक वे विशेषाधिकार वही माने जाएंगे जो 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है: हालांकि अनुच्छेद 105 के तहत संसद को अपने विशेषाधिकारों की रक्षा करने और अवमानना पर दंडित करने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन उच्चतम न्यायालय (जैसे 'केरल विधानमंडल बनाम के.आर. गणेश' या 'केशव सिंह वाद') ने यह स्पष्ट किया है कि यदि संसद का कोई विशेषाधिकार आदेश किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों (विशेषकर अनुच्छेद 21) का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका उसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) कर सकती है। विशेषाधिकारों का हनन न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से पूर्णतः बाहर नहीं है। कथन 2 सत्य है: संसद के सदस्यों को सदन के सत्र के दौरान तथा सत्रारंभ से 40 दिन पूर्व और सत्र की समाप्ति के 40 दिन बाद तक सिविल मामलों (Civil cases) में गिरफ्तारी से छूट प्राप्त होती है। यह उन्मुक्ति आपराधिक मामलों (Criminal offences) या निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) के मामलों पर लागू नहीं होती है। कथन 3 असत्य है: मूल संविधान के अनुच्छेद 105(3) में यह प्रावधान किया गया था कि संसद के विशेषाधिकार वही होंगे जो ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के हैं जब तक कि संसद खुद इन्हें कानून बनाकर तय न करे। परंतु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा इस संदर्भ को बदल दिया गया और यह प्रावधान किया गया कि संसद के विशेषाधिकार वही होंगे जो 44वें संशोधन के लागू होने के समय थे (न कि 26 जनवरी 1950 के)। अत: केवल कथन 2 सही है।
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भारतीय राजव्यवस्था और भारतीय संविधान के अंतर्गत 'संविधान संशोधन प्रक्रिया' (Article 368) तथा न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XX में अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन की दो प्रकार की पद्धतियों का उल्लेख किया गया है, जबकि कुछ अन्य अनुच्छेदों के तहत संशोधन साधारण बहुमत द्वारा भी किए जाते हैं, जिन्हें अनुच्छेद 368 के दायरे से बाहर रखा गया है।
2. 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, बशर्ते वह संशोधन संविधान के 'मूल ढाँचे' (Basic Structure) का उल्लंघन न करे।
3. संविधान (चौवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 द्वारा यह अनिवार्य कर दिया गया कि यदि संसद द्वारा संविधान के मूल ढाँचे को प्रभावित करने वाला कोई संशोधन किया जाता है, तो उसे लागू करने से पूर्व देश के कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन प्राप्त करना अनिवार्य होगा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक विकास के संदर्भ में, 'सार्वजनिक वितरण प्रणाली' (Public Distribution System - PDS) तथा 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013' (NFSA) के विधिक एवं कार्यात्मक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (NFSA) के प्रावधानों के अंतर्गत देश की लगभग 75% ग्रामीण और 50% शहरी आबादी को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के माध्यम से रियायती दरों पर खाद्यान्न प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार दिया गया है, तथा इस अधिनियम के तहत कवर किए गए पात्र व्यक्तियों को चावल, गेहूं और मोटे अनाज क्रमशः ₹3, ₹2 और ₹1 प्रति किलोग्राम की दरों पर प्रदान किए जाते हैं।
2. NFSA, 2013 के अंतर्गत प्रत्येक पात्र परिवार की सबसे बड़ी वयस्क महिला (जो 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की हो) को 'परिवार की मुखिया' (Head of the Household) माना जाएगा, जिसके नाम पर राशन कार्ड जारी किया जाना इस अधिनियम के तहत एक अनिवार्य वैधानिक प्रावधान है ताकि लैंगिक समानता और महिलाओं के सशक्तिकरण को बढ़ावा मिल सके।
3. 'खाद्य सुरक्षा भत्ता' (Food Security Allowance) के प्रावधान के अनुसार, यदि किसी कारणवश सरकार पात्र लाभार्थियों को खाद्यान्न या कूपन उपलब्ध कराने में असमर्थ रहती है, तो लाभार्थियों को नियमानुसार केंद्र सरकार द्वारा सीधे उनके बैंक खातों में नकद हस्तांतरण (Cash Transfer) के रूप में खाद्य सुरक्षा भत्ता प्रदान किया जाएगा।
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InsuranceDekho ने अपना Brand Ambassador किसे नियुक्त किया है?
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण' (National Biodiversity Authority - NBA) तथा 'जैव विविधता अधिनियम, 2002' से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) का गठन 'जैव विविधता अधिनियम, 2002' के प्रावधानों के तहत पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन एक सांविधिक (Statutory) और स्वायत्त निकाय के रूप में किया गया है, जिसका मुख्यालय चेन्नई, तमिलनाडु में स्थित है।
2. यह प्राधिकरण भारत के जैविक संसाधनों के संरक्षण, उनके संधारणीय उपयोग (Sustainable use) और जैव विविधता से प्राप्त होने वाले लाभों के निष्पक्ष एवं न्यायसंगत बंटवारे से संबंधित मामलों पर केंद्र सरकार को सलाह देता है, तथा विदेशी नागरिकों, कंपनियों या अनिवासी भारतीयों (NRIs) द्वारा देश के जैविक संसाधनों या उससे जुड़े पारंपरिक ज्ञान तक पहुँच (Access) प्राप्त करने के लिए NBA की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होता है।
3. 'जैव विविधता अधिनियम, 2002' के त्रि-स्तरीय प्रशासनिक ढांचे के तहत राष्ट्रीय स्तर पर NBA, राज्य स्तर पर राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBBs) तथा स्थानीय स्तर पर प्रत्येक गाँव या शहरी निकाय स्तर पर 'जैव विविधता प्रबंधन समितियों' (Biodiversity Management Committees - BMCs) का गठन अनिवार्य किया गया है, जिनका मुख्य कार्य उनके स्थानीय क्षेत्र के जैविक संसाधनों और उससे संबंधित पारंपरिक ज्ञान के अभिलेखन के लिए 'जन जैव विविधता रजिस्टर' (People's Biodiversity Register - PBR) तैयार करना है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत केंद्र-राज्य प्रशासनिक संबंधों (Administrative Relations - Articles 256-263) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 256 के अनुसार प्रत्येक राज्य की कार्यकारी शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाएगा जिससे संसद द्वारा बनाई गई विधियों और उस राज्य में लागू किसी पूर्ववर्ती केंद्रीय कानून का अनुपालन सुनिश्चित हो सके, तथा संघ की कार्यकारी शक्ति राज्य को ऐसे निर्देश देने तक विस्तारित होती है जो इस प्रयोजन के लिए आवश्यक हों।
2. अनुच्छेद 257 के तहत संघ की कार्यकारी शक्ति किसी राज्य को संचार के कुछ निश्चित साधनों के रखरखाव और उनके निर्माण के संबंध में निर्देश देने तक विस्तारित होती है, बशर्ते वे साधन संघ के लिए राष्ट्रीय या सैन्य महत्व के घोषित किए गए हों, और इसके अंतर्गत राज्यों को सैन्य महत्व के मार्गों की सुरक्षा के संबंध में भी निर्देश दिए जा सकते हैं।
3. अनुच्छेद 263 के अंतर्गत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि वह राज्यों के बीच या संघ और एक या अधिक राज्यों के बीच विवादों की जाँच करने और उन पर सलाह देने के लिए 'अंतर-राज्य परिषद' (Inter-State Council) की स्थापना कर सके, तथा इस परिषद के निर्णयों को सभी संबंधित राज्यों और केंद्र सरकार पर कानूनी रूप से बाध्यकारी (Legally Binding) बनाया गया है।
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