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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत 'संविधान संशोधन प्रक्रिया' और उसके प्रकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान का संशोधन संसद के किसी भी सदन में इस प्रयोजन के लिए विधेयक प्रस्तुत करके ही आरंभ किया जा सकता है, और इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेना अनिवार्य होता है।
  2. 2. संविधान के कुछ विशिष्ट प्रावधानों, जैसे कि राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया या संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व, में संशोधन करने के लिए न केवल संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से पारित किया जाना आवश्यक है, बल्कि कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से उसका अनुसमर्थन (Ratification) किया जाना भी अनिवार्य है।
  3. 3. अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संसद को संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु सर्वोच्च न्यायालय के 'केशवानंद भारती वाद (1973)' के निर्णय के अनुसार, संसद अपनी इस संविधान संशोधन शक्ति का प्रयोग करके संविधान के 'मूल ढांचा' (Basic Structure) को नष्ट या समाप्त नहीं कर सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 असत्य है: संविधान संशोधन विधेयक संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में प्रस्तुत किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Recommendation/Permission) लेना आवश्यक नहीं है। इसे मंत्री या किसी गैर-सरकारी सदस्य (Private Member) द्वारा बिना राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के पेश किया जा सकता है, हालांकि यदि विधेयक राज्य के क्षेत्रों या सीमाओं को प्रभावित करता है तो राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है, लेकिन सामान्य संशोधन के लिए नहीं। कथन 2 सत्य है: संविधान के अनुच्छेद 368(2) के अनुसार, यदि संविधान के संघीय ढांचे से जुड़े प्रावधानों (जैसे राष्ट्रपति का निर्वाचन, संघ और राज्यों की कार्यकारी शक्तियों का विस्तार, उच्चतम और उच्च न्यायालय, संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व आदि) में संशोधन करना हो, तो संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत के साथ-साथ कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन आवश्यक है। कथन 3 सत्य है: केशवानंद भारती वाद (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया था कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग में संशोधन करने की व्यापक शक्ति है, किंतु वह संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure) का उल्लंघन नहीं कर सकती।
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