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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 110' के अंतर्गत 'धन विधेयक' (Money Bill) की परिभाषा और उसकी विधायी प्रक्रिया के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार, कोई विधेयक केवल तभी धन विधेयक माना जाएगा जब उसमें कर लगाने, सरकार द्वारा धन उधार लेने, भारत की संचित निधि या आकस्मिकता निधि से धन जमा करने या निकालने से संबंधित सभी या कोई विशिष्ट प्रावधान शामिल हों।
- 2. लोकसभा के अध्यक्ष (Speaker) का यह निर्णय अंतिम होता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, और उसके इस निर्णय को किसी भी न्यायालय में, संसद के किसी भी सदन में या राष्ट्रपति के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- 3. धन विधेयक को राज्यसभा में पुनः स्थापित (Introduce) नहीं किया जा सकता है, और राज्यसभा को इसे पारित करने या अपनी सिफारिशें देने के लिए अधिकतम 30 दिनों की समयावधि प्राप्त होती है, जिसके भीतर यदि राज्यसभा इसे वापस नहीं करती है, तो विधेयक को दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार, कोई विधेयक धन विधेयक तभी माना जाता है जब उसमें केवल कर लगाने, उन्मूलन, छूट; भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने; संचित निधि या आकस्मिकता निधि के अभिरक्षा, धन जमा करने या निकालने; अथवा भारत की संचित निधि से धन का विनियोग करने से संबंधित विशिष्ट मामले शामिल हों। यदि इसमें अन्य विषय भी मिला दिए जाएं, तो यह धन विधेयक नहीं रहता।
कथन 2 सही है: अनुच्छेद 110 (3) के अनुसार, यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, तो लोकसभा के अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है। इसके अलावा, अध्यक्ष के इस प्रमाण पत्र पर कि कोई विधेयक धन विधेयक है, किसी भी न्यायालय या सदन में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है।
कथन 3 गलत है: धन विधेयक केवल लोकसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है (राज्यसभा में नहीं), लेकिन राज्यसभा को इस विधेयक पर विचार करने के लिए केवल 14 दिनों की समयावधि मिलती है, न कि 30 दिनों की। 14 दिनों के भीतर यदि राज्यसभा इसे नहीं लौटाती है, तो इसे दोनों सदनों द्वारा उस रूप में पारित मान लिया जाता है जिस रूप में यह लोकसभा द्वारा पारित किया गया था।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 263' के अंतर्गत 'अंतर-राज्य परिषद' (Inter-State Council) की स्थापना, उसकी संरचना और कार्यों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 263 के अनुसार, अंतर-राज्य परिषद की स्थापना करने की शक्ति राष्ट्रपति के पास निहित है, यदि राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि ऐसा करने से सार्वजनिक हितों की प्राप्ति होगी।
2. इस परिषद की अध्यक्षता प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है, और इसके सदस्यों में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, संघ राज्य क्षेत्रों (जिनकी विधानसभाएं हैं) के मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति शासन के अधीन राज्यों के राज्यपाल तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्रिपरिषद के कैबिनेट स्तर के मंत्री शामिल होते हैं।
3. अंतर-राज्य परिषद एक स्थायी संवैधानिक निकाय (Permanent Constitutional Body) है जिसका मुख्य कार्य राज्यों के बीच विवादों की जांच करना और उन पर निर्णय देना है, और इस परिषद का निर्णय सभी संबंधित राज्यों और केंद्र सरकार पर पूर्णतः बाध्यकारी (Binding) होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'हरित बांड' (Green Bonds) और उनके नियमन तथा प्रभाव के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हरित बांड ऐसे निश्चित आय वाले वित्तीय साधन (Fixed-income instruments) हैं, जिनका उपयोग विशेष रूप से नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, सतत कृषि और प्रदूषण नियंत्रण जैसी पर्यावरण-अनुकूल (Eco-friendly) परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए किया जाता है।
2. भारत में सॉवरेन ग्रीन बांड (Sovereign Green Bonds) जारी करने का ढांचा केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा तैयार किया गया है, और इसके तहत जुटाई जाने वाली धनराशि को देश की राजकोषीय घाटे की भरपाई के लिए किसी भी सरकारी उद्देश्य में खर्च किया जा सकता है।
3. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के 'इश्यू एंड लिस्टिंग ऑफ नॉन-कन्वर्टिबल सिक्योरिटीज' (NCS) विनियम, हरित बांड जारी करने वाली कंपनियों के लिए पर्यावरण-लाभ के उपयोग और प्रबंधन की वार्षिक रिपोर्टिंग को अनिवार्य बनाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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सामान्य विज्ञान और पर्यावरण के संदर्भ में, 'कोरल ब्लीचिंग' (Coral Bleaching) और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कोरल ब्लीचिंग मुख्य रूप से तब होती है जब समुद्री जल के तापमान में असामान्य वृद्धि होती है, जिसके कारण प्रवाल (Corals) अपने ऊतकों में निवास करने वाले सहजीवी शैवाल (Zooxanthellae) को बाहर निकाल देते हैं, जिससे प्रवाल अपना प्राकृतिक रंग खो देते हैं और सफेद हो जाते हैं।
2. प्रवाल विरंजन (Bleaching) का अर्थ यह है कि प्रवाल की मृत्यु हो गई है, और विरंजन की प्रक्रिया शुरू होने के बाद किसी भी स्थिति में प्रवाल पुनर्जीवित (Recover) नहीं हो सकते हैं।
3. जलवायु परिवर्तन और महासागर अम्लीकरण (Ocean Acidification) के अलावा, अत्यधिक पराबैंगनी (UV) विकिरण, तटीय प्रदूषण और एल नीनो (El Niño) जैसी मौसमी घटनाएं भी कोरल ब्लीचिंग के प्रमुख कारकों में शामिल हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 355' और 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत केंद्र के दायित्वों तथा आपातकालीन प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 355 केंद्र सरकार पर यह संवैधानिक कर्तव्य आरोपित करता है कि वह बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे और यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार ही चलाई जा रही है।
2. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' मामले में यह व्यवस्था दी गई कि राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है, और यदि उद्घोषणा असंवैधानिक पाई जाती है, तो न्यायालय भंग की गई राज्य विधानसभा को पुनर्जीवित भी कर सकता है।
3. अनुच्छेद 356 के तहत जारी राष्ट्रपति शासन की घोषणा के पश्चात, राज्य विधानसभा को या तो तुरंत भंग कर दिया जाता है या उसे निलंबित (Suspended animation) रखा जाता है, और जब तक संसद के दोनों सदनों द्वारा इस घोषणा का अनुमोदन नहीं किया जाता, तब तक राज्य विधानसभा को पूर्णतः भंग नहीं किया जा सकता है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
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