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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 105' के अंतर्गत संसद सदस्यों के 'संसदीय विशेषाधिकार' (Parliamentary Privileges) और 'अनुच्छेद 194' के तहत राज्य विधानमंडल के सदस्यों के विशेषाधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान द्वारा संसद या इसके सदस्यों को विशिष्ट रूप से कोई भी नया विशेषाधिकार स्थायी रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, बल्कि यह प्रावधान किया गया है कि इसके विशेषाधिकार वही होंगे जो ब्रिटेन की 'हाउस ऑफ कॉमन्स' (House of Commons) के पास संविधान लागू होने के समय थे।
- 2. संसद सदस्यों को सदन के भीतर या उसकी किसी समिति में कही गई किसी भी बात या दिए गए किसी भी मत के संबंध में किसी भी न्यायालय में किसी भी प्रकार की कार्यवाही से पूर्ण उन्मुक्ति (Immunity) प्राप्त होती है, और यह उन्मुक्ति उनके सदन की सदस्यता समाप्त होने के बाद भी बनी रहती है।
- 3. जब संसद का सत्र चल रहा हो, तब संसद के सदस्यों को किसी दीवानी मामले (Civil Cases) में सदन के आरंभ होने से 40 दिन पूर्व और उसकी समाप्ति के 40 दिन बाद तक गिरफ्तार किए जाने से छूट (Freedom from arrest) का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, चाहे मामला आपराधिक हो या दीवानी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 गलत है: यद्यपि संविधान के प्रारंभ में यह व्यवस्था की गई थी कि संसद के विशेषाधिकार वही होंगे जो ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के पास हैं, किंतु 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा इसे बदल दिया गया। अब संविधान यह प्रावधान करता है कि संसद और उसके सदस्यों के विशेषाधिकार वही होंगे जो समय-समय पर संसद द्वारा कानून बनाकर निर्धारित किए जाएंगे, और जब तक ऐसा कानून नहीं बनता, तब तक वे वही रहेंगे जो 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय थे (लेकिन अब सीधे तौर पर ब्रिटिश संसद के संदर्भ को हटाकर इसे भारतीय संसद के अपने अधिनियमों पर आधारित किया गया है)।
कथन 2 सही है: संविधान के अनुच्छेद 105(2) के अनुसार, संसद में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात या दिए गए मत के लिए संसद के किसी भी सदस्य के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी। यह पूर्ण उन्मुक्ति है जो सदन के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए दी गई है और यह सदस्यता समाप्त होने के बाद भी सुरक्षित रहती है।
कथन 3 गलत है: संसद सदस्यों को केवल 'दीवानी मामलों' (Civil Cases) में ही सदन के सत्र के दौरान और उसके आरंभ होने से 40 दिन पूर्व तथा समाप्ति के 40 दिन बाद तक गिरफ्तार किए जाने से छूट प्राप्त है। यह छूट **आपराधिक मामलों (Criminal Cases)**, निवारक नजरबंदी (Preventive Detention) या न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) के मामलों में बिल्कुल लागू नहीं होती है।
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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत' (Plate Tectonics Theory) और पृथ्वी के स्थलमंडल (Lithosphere) की गतियों से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अभिसारी सीमा (Convergent Boundary) वह क्षेत्र है जहाँ दो टेक्टोनिक प्लेटें एक-दूसरे से विपरीत दिशा में दूर जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप महासागरीय पर्पटी (Oceanic crust) का निर्माण होता है और मध्य-महासागरीय कटकों (Mid-oceanic ridges) का विकास होता है।
2. रूपांतर भ्रंश सीमा (Transform Fault Boundary) पर न तो नई पर्पटी का निर्माण होता है और न ही पुरानी पर्पटी का विनाश होता है, क्योंकि यहाँ प्लेटें एक-दूसरे के आमने-सामने क्षैतिज दिशा में फिसलती हैं, जिसके कारण इस क्षेत्र में तीव्र भूकंप आते हैं लेकिन सामान्यतः ज्वालामुखी गतिविधियां नहीं होती हैं।
3. जब एक भारी महासागरीय प्लेट और एक हल्की महाद्वीपीय प्लेट आपस में टकराती हैं, तो भारी महासागरीय प्लेट हल्की प्लेट के नीचे क्षेपित (Subduct) हो जाती है, जिससे महासागरीय खाइयों (Trenches) का निर्माण होता है तथा महाद्वीपीय मार्जिन पर वलित पर्वतों (Fold Mountains) और ज्वालामुखीय श्रृंखलाओं का विकास होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XI' के अंतर्गत केंद्र-राज्य विधाई संबंधों (Centre-State Legislative Relations - Articles 245-255) से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 245 के अनुसार संसद को भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है, तथा किसी राज्य के विधानमंडल को उस राज्य के संपूर्ण या किसी भाग के लिए कानून बनाने की अधिकारिता है, किंतु संसद को ऐसे राज्य-क्षेत्रीय अतीत-प्रभावी (Extraterritorial) कानून बनाने की शक्ति प्राप्त नहीं है जो भारत के बाहर लागू होते हों।
2. अनुच्छेद 249 के अंतर्गत यदि राज्य सभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से एक संकल्प पारित करती है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक है कि संसद राज्य सूची में शामिल किसी भी विषय पर कानून बनाए, तो संसद पूरे देश या उसके किसी भाग के लिए उस विषय पर विधि बना सकती है, और ऐसा संकल्प अधिकतम एक वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहता है।
3. अनुच्छेद 254 के अनुसार यदि समवर्ती सूची (Concurrent List) के किसी विषय पर राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून संसद द्वारा पहले बनाए गए या बाद में बनाए गए किसी कानून के उपबंध के विरुद्ध (Repugnant) होता है, तो संसद द्वारा निर्मित कानून ही मान्य होगा, चाहे राज्य का कानून राष्ट्रपति की अनुमति के लिए आरक्षित रखा गया हो और उसे राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल गई हो या नहीं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग XVIII' के अंतर्गत 'आपात उपबंध' (Emergency Provisions - अनुच्छेद 352 से 360) के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा संपूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए 'युद्ध', 'बाह्य आक्रमण' या 'सशस्त्र विद्रोह' (Armed Rebellion) के आधार पर की जा सकती है, और मूल संविधान में 'सशस्त्र विद्रोह' शब्द के स्थान पर 'आंतरिक अशांति' (Internal Disturbance) शब्द का प्रयोग किया गया था जिसे 44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा बदला गया था।
2. राष्ट्रीय आपातकाल की उदघोषणा करने वाले प्रस्ताव को संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत तथा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित किया जाना अनिवार्य है, और एक बार अनुमोदित होने के बाद यह आपातकाल अनिश्चितकाल तक प्रवृत्त रह सकता है बशर्ते इसे हर छह महीने में संसद द्वारा पुनः अनुमोदित कराया जाए।
3. अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन (President's Rule) लागू होने की स्थिति में राज्य के विधानमंडल को निलंबित या विघटित किया जा सकता है, किंतु राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने की संसद की शक्ति के अंतर्गत उच्च न्यायालयों (High Courts) की संवैधानिक शक्तियों और अधिकारक्षेत्र को कम करने या उनमें संशोधन करने का अधिकार संसद को प्राप्त नहीं होता है।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' के अंतर्गत 'मूल अधिकार' (Fundamental Rights - Articles 12-35) और न्यायिक समीक्षा से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 13(2) के अनुसार राज्य कोई ऐसी विधि नहीं बनाएगा जो भाग III द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती है या न्यून करती है, और इस प्रकार की बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य (Void) होगी, तथा इसके अंतर्गत 'विधि' (Law) शब्द में संसद या राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए अधिनियमों के अलावा अध्यादेश, आदेश, उप-विधि, नियम और रूढ़ि या प्रथा (Custom) भी शामिल हैं।
2. 'केशवानंद भारती वाद (1973)' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि संसद को अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन करने की असीमित शक्ति प्राप्त है, जिसके अंतर्गत वह मूल अधिकारों को भी पूर्णतः समाप्त कर सकती है क्योंकि संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ के अंतर्गत 'विधि' (Law) की परिभाषा में शामिल नहीं होता है।
3. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार स्वयं में एक मूल अधिकार है, और सर्वोच्च न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) और उत्प्रेषण (Certiorari) नामक पाँच प्रकार की रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, जबकि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत केवल बंदी प्रत्यक्षीकरण और परमादेश रिट जारी करने की ही शक्ति है।
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