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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति (Pardoning Power) और इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति एक कार्यपालिका शक्ति (Executive Power) है, और संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए प्रत्येक मामले में मृत्युदंड को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने का अनन्य संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, जिसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में अपील नहीं की जा सकती है।
  2. 2. ऐतिहासिक 'इEपुर सुधाकर राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2006)' और 'एपिगैटा राव' वादों सहित सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के अधीन होता है, तथा इस शक्ति का प्रयोग किसी भी प्रकार के राजनीतिक पक्षपात या मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता है।
  3. 3. सर्वोच्च न्यायालय ने 'केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989)' वाद में यह निर्धारित किया था कि राष्ट्रपति को अनुच्छेद 72 के तहत दया याचिका पर निर्णय लेते समय यह आवश्यक नहीं है कि वह दोषी के न्यायिक रिकॉर्ड या अदालती दस्तावेजों का पुनर्मूल्यांकन करे, क्योंकि न्यायालय के अंतिम निर्णय के बाद राष्ट्रपति की यह शक्ति पूरी तरह से एक कार्यकारी अनुग्रह (Executive Grace) है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है: यद्यपि अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दिए गए दंडादेशों के मामलों में भी क्षमादान की शक्ति प्राप्त है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रपति के निर्णय के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) नहीं की जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने 'इEपुर सुधाकर राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' और 'मारू राम बनाम भारत संघ' जैसे वादों में स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का प्रयोग मनमाने, दुर्भावनापूर्ण या राजनीतिक भेदभावपूर्ण आधार पर किए जाने पर उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। कथन 2 सही है: संविधान के अनुच्छेद 74 के अनुसार, राष्ट्रपति अपनी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार करते हैं। क्षमादान शक्ति कोई व्यक्तिगत विवेकाधिकार नहीं है, बल्कि यह मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर आधारित एक कार्यपालिका शक्ति है, और इसे मनमाने ढंग से प्रयोग नहीं किया जा सकता। कथन 3 गलत है: 'केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989)' वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि राष्ट्रपति को अनुच्छेद 72 के तहत दया याचिका पर विचार करते समय यह अधिकार है (और वे ऐसा कर सकते हैं) कि वे मामले के रिकॉर्ड और साक्ष्यों का अध्ययन करें। न्यायालय ने यह भी कहा था कि राष्ट्रपति अदालत के निर्णय से भिन्न निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं, क्योंकि यह शक्ति न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह परे नहीं है और इसमें दया याचिकाकर्ता के मामले के सभी पहलुओं का मूल्यांकन शामिल हो सकता है। अतः कथन 3 का यह कहना कि 'न्यायिक रिकॉर्ड का पुनर्मूल्यांकन आवश्यक नहीं है और यह केवल कार्यकारी अनुग्रह है' भ्रामक और आंशिक रूप से गलत है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे को रेखांकित किया है।
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