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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 105' के अंतर्गत संसद सदस्यों के 'संसदीय विशेषाधिकारों' (Parliamentary Privileges) और 'अनुच्छेद 194' के अंतर्गत राज्य विधानमंडल के सदस्यों के विशेषाधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुसार संसद में या उसकी किसी समिति में संसद सदस्य द्वारा कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में किसी भी न्यायालय में उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती, और यह उन्मुक्ति (Immunity) संसद के सदस्यों के साथ-साथ उन व्यक्तियों को भी प्राप्त है जो संसद की कार्यवाही या उसके किसी सदन के प्राधिकार से किसी रिपोर्ट, पत्र, वोटों या विवरण को प्रकाशित करते हैं।
- 2. यदि संसद का कोई सदन अपने किसी विशेषाधिकार के हनन या सदन की अवमानना (Breach of Privilege or Contempt of House) के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करता है या सदन के समक्ष हाजिर होने का आदेश देता है, तो न्यायालयों को इस बात की न्यायिक समीक्षा करने का पूर्ण अधिकार है कि सदन द्वारा अपनी विशेषाधिकार शक्ति का प्रयोग किस प्रक्रिया के तहत किया गया है, और न्यायालय विशेषाधिकार के दायरे को तय कर सकता है।
- 3. जब तक संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध (Codify) करने के लिए कोई विशेष कानून नहीं बनाया जाता है, तब तक भारत के प्रत्येक सदन और उसके सदस्यों व समितियों के विशेषाधिकार वही माने जाएंगे जो 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के ठीक पहले यूनाइटेड किंगडम की 'हाउस ऑफ कॉमन्स' (House of Commons) के पास थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 105(1) और (2) के अनुसार संसद सदस्यों को सदन या उसकी समितियों में कही गई बात या दिए गए मत के लिए किसी न्यायालय में उत्तरदायी नहीं ठहराया जाना सुनिश्चित किया गया है। इसके अलावा, 'पार्लियामेंट्री प्रोसीडिंग्स (प्रोटेक्शन ऑफ पब्लिकेशन) एक्ट, 1956' के तहत संसद की अधिकृत रिपोर्टों के प्रकाशन पर भी यह उन्मुक्ति लागू होती है। कथन 2 गलत है: 'केशव सिंह मामला (उत्तर प्रदेश विधानसभा मामला, 1964)' तथा अन्य निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि विधानमंडल या संसद किसी विशेषाधिकार के हनन के तहत किसी व्यक्ति को दंडित करती है, तो न्यायालय यह जाँच कर सकता है कि क्या ऐसा विशेषाधिकार वास्तव में अस्तित्व में है या नहीं, लेकिन सदन द्वारा अपनी प्रक्रिया के आंतरिक मामलों और विशेषाधिकार के उल्लंघन के निर्णय की व्यापक न्यायिक समीक्षा सीधे तौर पर सीमित है; साथ ही, यदि विशेषाधिकार और मौलिक अधिकारों (जैसे अनुच्छेद 21) में टकराव होता है, तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। कथन 3 सही है: संविधान के अनुच्छेद 105(3) और 194(3) में मूल रूप से यह प्रावधान किया गया था कि जब तक संसद या विधानमंडल अपनी सुविधानुसार विशेषाधिकारों को कानून बनाकर संहिताबद्ध (Codify) नहीं करते, तब तक ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के विशेषाधिकार लागू रहेंगे (44वें संविधान संशोधन 1978 द्वारा 'ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स' शब्द को हटाकर इसके स्थान पर उस सदन के सदस्यों के विशेषाधिकारों को संदर्भित कर दिया गया, लेकिन व्यावहारिक रूप से ऐतिहासिक संदर्भ और परंपराएं वही बनी हुई हैं)।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 76' (Article 76) के अंतर्गत 'भारत के महान्यायवादी' (Attorney General for India) के पद, शक्तियों और उसके विशेषाधिकारों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह व्यक्ति इस पद पर नियुक्त होने के लिए अर्ह होगा जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए योग्य है, अथवा जो कम से कम पाँच वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो या दस वर्ष तक उच्च न्यायालय में अधिवक्ता रहा हो।
2. महान्यायवादी भारत सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार होता है, और उसे देश के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है, साथ ही उसे संसद के दोनों सदनों या उनकी संयुक्त बैठकों में बोलने तथा उसकी कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होता है, किंतु उसे किसी भी स्थिति में मतदान करने का अधिकार प्राप्त नहीं होता है।
3. संविधान के अनुच्छेद 76 के तहत महान्यायवादी का निश्चित कार्यकाल (Term of office) पाँच वर्ष निर्धारित किया गया है, और उसे केवल संसद द्वारा महाभियोग (Impeachment) की प्रक्रिया के माध्यम से ही उसके पद से हटाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 263' के अंतर्गत 'अंतर-राज्य परिषद' (Inter-State Council) के गठन, शक्तियों और उसके कामकाज के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि किसी समय उसे यह प्रतीत होता है कि एक अंतर-राज्य परिषद की स्थापना से लोक हितों की प्राप्ति होगी, तो वह इस परिषद की स्थापना कर सकता है और इसके गठन, कर्तव्यों तथा प्रक्रिया को परिभाषित कर सकता है।
2. सरकारी आयोग (Sarkaria Commission) की संस्तुतियों के आधार पर वर्ष 1990 में पहली बार राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अंतर-राज्य परिषद का गठन किया गया था, और प्रधानमंत्री इस परिषद के पदेन अध्यक्ष (Ex-officio Chairman) होते हैं।
3. अंतर-राज्य परिषद एक स्थायी संवैधानिक निकाय (Permanent Constitutional Body) है जिसकी बैठकें संविधान के प्रावधानों के तहत वर्ष में अनिवार्य रूप से तीन बार आयोजित की जानी चाहिए, और इसके द्वारा लिए गए सभी निर्णय राज्यों के लिए बाध्यकारी (Binding) होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 324' के अंतर्गत 'भारत के निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) और मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा अन्य आयुक्तों की स्वतंत्रता एवं सेवा शर्तों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 324 (5) के अनुसार, मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है, जबकि निर्वाचन आयुक्तों को हटाने के लिए संसद के महाभियोग प्रस्ताव की कोई आवश्यकता नहीं होती और उन्हें मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा कभी भी हटाया जा सकता है।
2. निर्वाचन आयोग के अन्य आयुक्तों या प्रादेशिक आयुक्तों की सेवा शर्तें और पदावधि राष्ट्रपति द्वारा संसद द्वारा इस निमित्त बनाई गई विधि के अधीन रहते हुए निर्धारित की जाती हैं।
3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को अपनी पदावधि के दौरान उसके वेतन, भत्ते और अन्य सेवा लाभों में कोई भी अलाभकारी परिवर्तन (Disadvantageous variation) करने की संवैधानिक अनुमति नहीं है, सिवाय उस वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360) की स्थिति के जब पूरे देश में ऐसा प्रावधान लागू किया गया हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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