BaalVikas
Menu
Civil services
Asked 2 months ago · Viewed 12 times

भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) तथा इसके न्यायिक अर्थघटन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को किसी ऐसे विषय से संबंधित विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की शक्ति प्राप्त है जिस विषय तक राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है।
  2. 2. राज्यपाल के पास 'मृत्युदंड' (Death Sentence) के मामलों में उसे पूर्ण रूप से क्षमा (Pardon) करने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है, भले ही संबंधित राज्य के कानून में मृत्युदंड का प्रावधान क्यों न हो, क्योंकि यह शक्ति अनन्य रूप से भारत के राष्ट्रपति के पास निहित है।
  3. 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि राज्यपाल द्वारा क्षमादान की शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अधीन होता है, किंतु यदि राज्य सरकार की मंत्रिपरिषद ऐसी किसी शक्ति के प्रयोग की सलाह नहीं देती है, तो राज्यपाल अपने स्वविवेक से अकेले ही संपूर्ण क्षमादान दे सकते हैं, जिसकी न्यायिक समीक्षा किसी भी न्यायालय में नहीं की जा सकती।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार, राज्यपाल को उस राज्य की कार्यकारी शक्ति के विस्तार वाले विषयों से संबंधित विधियों के विरुद्ध अपराधों के लिए दंडित व्यक्तियों के संबंध में क्षमा, प्राвариंभ, विराम या परिहार की शक्ति प्राप्त है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल के पास मृत्युदंड को पूरी तरह से माफ (Pardon) करने की शक्ति नहीं है। यहाँ तक कि यदि किसी राज्य के कानून में मृत्युदंड का प्रावधान है, तब भी मृत्युदंड को पूरी तरह से क्षमा करने की अनन्य शक्ति केवल राष्ट्रपति (अनुच्छेद 72 के तहत) के पास है। हालाँकि, राज्यपाल मृत्युदंड के मामले में भी निलंबन, परिहार या लघुकरण कर सकते हैं, किंतु पूर्ण क्षमा नहीं दे सकते। कथन 3 गलत है: राज्यपाल अपनी क्षमादान शक्ति का प्रयोग अपने व्यक्तिगत स्वविवेक से नहीं कर सकते, बल्कि वे संविधान के सामान्य सिद्धांतों के तहत संबंधित राज्य की मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार ही इस शक्ति का प्रयोग करते हैं। इसके अलावा, उच्चतम न्यायालय (जैसे 'इरम رحمان' और अन्य मामलों में) यह स्पष्ट कर चुका है कि राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान की शक्ति के प्रयोग की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है यदि यह शक्ति दुर्भावनापूर्ण, मनमाने ढंग से या प्रासंगिक तथ्यों को नजरअंदाज करके उपयोग की गई हो। अतः कथन 3 गलत है।
Share:
अगला प्रश्न → सामान्य विज्ञान और पर्यावरण के संदर्भ में, हाल के वर्षों में चर्चा में रहे… ← पिछला प्रश्न भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'महासागरीय तापीय…

Related Questions

→ भारतीय अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास के संदर्भ में, हाल के दिनों में चर्चा में रहे 'हरित बॉन्ड' (Green Bonds) और 'सॉवरन ग्रीन बॉन्ड फ्रेमवर्क' (Sovereign Green Bond Framework) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. हरित बॉन्ड एक प्रकार का निश्चित आय वाला वित्तीय उपकरण (fixed-income instrument) है जिसका उपयोग विशेष रूप से पर्यावरण के अनुकूल या जलवायु-परिवर्तन से जुड़े (climate-friendly) परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिए किया जाता है, जैसे कि नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ परिवहन। 2. भारत के 'सॉवरन ग्रीन बॉन्ड फ्रेमवर्क' के तहत जुटाई जाने वाली आय को केंद्र सरकार के सार्वजनिक ऋण प्रबंधन के सामान्य बजट में एकीकृत किया जाता है, और इसका उपयोग किसी भी सरकारी योजना या राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए बिना किसी पर्यावरणीय प्रतिबंध के किया जा सकता है। 3. भारत सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले सॉवरन ग्रीन बॉन्ड के द्वितीयक बाजार (secondary market) में व्यापार और तरलता (liquidity) को बढ़ावा देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इन बॉन्डों को 'वैधानिक तरलता अनुपात' (SLR) गणना के प्रयोजन के लिए पात्र घोषित किया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में, वर्ष 1928 में गठित 'नेहरू रिपोर्ट' (Nehru Report) और इसकी संस्तुतियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. नेहरू रिपोर्ट ने भारत के लिए 'डोमिनियन स्टेटस' (Dominion Status) की मांग की थी, जिसे उस समय युवा राष्ट्रवादियों जैसे जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्वीकार कर लिया गया था क्योंकि उनका मानना था कि यह पूर्ण स्वराज की दिशा में पहला व्यावहारिक कदम है। 2. इस रिपोर्ट में देश के लिए एक नई संविधान रूपरेखा प्रस्तावित की गई थी जिसमें केंद्र में मजबूत शक्तियों के साथ एकात्मक झुकाव वाला संघीय ढांचा सुझाया गया था, तथा भाषाई आधार पर प्रांतों के पुनर्गठन की सिफारिश की गई थी। 3. धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों के संदर्भ में, नेहरू रिपोर्ट ने केंद्र और प्रांतीय विधानसभाओं में मुसलमानों के लिए किसी भी प्रकार के 'पृथक निर्वाचक मंडल' (Separate Electorates) के प्रावधान को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया था, हालांकि इसने आबादी के अनुपात में अल्पसंख्यकों के लिए सीटों के आरक्षण की वकालत की थी। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'महासागरीय आम परिसंचरण' (Oceanic General Circulation) और 'अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन' (AMOC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. AMOC अटलांटिक महासागर में संचालित होने वाली एक प्रमुख थर्मोहलाइन (Thermomohaline) धारा प्रणाली है, जो भूमध्यरेखीय क्षेत्रों से उष्ण और नम जल को उत्तर की ओर (उत्तरी अटलांटिक) ले जाती है और ठंडे, सघन जल को गहराई में दक्षिण की ओर वापस भेजती है। 2. उत्तरी अटलांटिक महासागर में ग्रीनलैंड के पिघलते हुए हिमनदों और अत्यधिक वर्षा के कारण बड़े पैमाने पर मीठे (अलवण) जल का प्रवेश AMOC की तीव्रता को बढ़ाने का कार्य करता है, जिससे यूरोप में तापमान में भारी वृद्धि होती है। 3. हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों से यह संकेत मिला है कि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापन के कारण AMOC अपनी सुझाई गई गति से कमजोर हो रहा है, जिसके पूरी तरह से ठप होने पर उत्तर-पश्चिमी यूरोप में गंभीर शीतलन (Severe Cooling) और दक्षिण अमेरिकी तथा अफ्रीकी मानसून प्रणालियों में भारी व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 124' के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति' और इसके लिए 'कॉलेजियम प्रणाली' के विकास से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के मूल पाठ में यह प्रावधान था कि उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात की जाएगी, जिनसे परामर्श करना राष्ट्रपति के लिए संवैधानिक रूप से अनिवार्य था। 2. 'द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993)' में उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह निर्णय दिया था कि 'परामर्श' (Consultation) शब्द का अर्थ 'सहमति' (Concurrence) है, और इसके तहत मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम की राय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगी। 3. 'नब्बेवां संविधान संशोधन अधिनियम, 2011' के माध्यम से 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' (NJAC) की स्थापना की गई थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 'चौथे न्यायाधीश मामला (2015)' में संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था। 2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है। 3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.