Civil services
Asked 2 months ago · Viewed 18 times
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 143' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के 'सलाहकार क्षेत्राधिकार' (Advisory Jurisdiction) की प्रकृति, इसकी सीमाओं और इससे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि किसी समय उन्हें प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है जो लोक महत्व का है, तो वे उस पर सर्वोच्च न्यायालय की राय प्राप्त करने के लिए उसे विचार हेतु संदर्भित कर सकते हैं।
- 2. यदि विधि या तथ्य का कोई प्रश्न अनुच्छेद 143(1) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय को संदर्भित किया जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय के लिए यह वैधानिक रूप से अनिवार्य है कि वह उस पर अपनी राय राष्ट्रपति को दे, और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई यह सलाह राष्ट्रपति के लिए हर स्थिति में बाध्यकारी होती है।
- 3. 'पूर्व-संविधान' (Pre-constitution) काल की संधियों, करारों, प्रसंविदाओं या अन्य इसी प्रकार के दस्तावेजों से उत्पन्न होने वाले विवादों के संबंध में, अनुच्छेद 143(2) के तहत राष्ट्रपति के लिए सर्वोच्च न्यायालय की राय लेना अनिवार्य है, और ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय भी अपनी राय राष्ट्रपति को देने के लिए बाध्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति को यह प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है जो लोक महत्व का है, तो वे उस पर सर्वोच्च न्यायालय की राय मांग सकते हैं।
कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 143 के तहत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई सलाह राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं होती है (यह राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर है कि वे इसे मानें या न मानें), और न ही यह सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय (Judgment) होती है।
कथन 3 सही है: अनुच्छेद 143(2) के तहत, संविधान के प्रारंभ से पहले की किसी संधि, समझौते, प्रसंविदा आदि से उत्पन्न विवादों के मामलों में राष्ट्रपति के लिए सर्वोच्च न्यायालय को मामला 'निर्देशित करना अनिवार्य' है, और ऐसी स्थिति में सर्वोच्च न्यायालय के लिए भी अपनी राय राष्ट्रपति को देना बाध्यकारी होता है। अतः केवल कथन 1 और 3 सही हैं।
अगला प्रश्न →
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 263'…
← पिछला प्रश्न
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय…
Related Questions
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 105' (সংসद् के सदनों की, तथा उनके सदस्यों और समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकारों आदि) के अंतर्गत संसद सदस्यों के संसदीय विशेषाधिकारों और 'संसदीय उन्मुक्ति' (Parliamentary Immunity) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 105(2) के अनुसार, संसद में या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में संसद के किसी भी सदस्य के खिलाफ किसी भी न्यायालय में कोई भी कार्यवाही (चाहे वह दीवानी हो या आपराधिक) नहीं चलाई जा सकती है।
2. 'पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम सीबीआई (1998)' मामले में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने यह निर्णय दिया था कि यदि कोई सांसद संसद में किसी प्रस्ताव पर मतदान करने के लिए रिश्वत स्वीकार करता है, तो उसे अनुच्छेद 105(2) के तहत दी गई संसदीय उन्मुक्ति और आपराधिक अभियोजन से पूर्ण संरक्षण प्राप्त होगा।
3. 'झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) रिश्वतखोरी मामला (2024)' में उच्चतम न्यायालय की सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने पिछले 1998 के फैसले को पलटते हुए यह व्यवस्था दी कि रिश्वत लेने वाले सांसदों को अनुच्छेद 105 या अनुच्छेद 194 के तहत मिलने वाले संसदीय विशेषाधिकारों से कोई कानूनी संरक्षण प्राप्त नहीं होगा, और ऐसे मामलों में उन पर आपराधिक न्यायालयों द्वारा मुकदमा चलाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 124' के अंतर्गत 'उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति' और इसके लिए 'कॉलेजियम प्रणाली' के विकास से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के मूल पाठ में यह प्रावधान था कि उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के पश्चात की जाएगी, जिनसे परामर्श करना राष्ट्रपति के लिए संवैधानिक रूप से अनिवार्य था।
2. 'द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993)' में उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह निर्णय दिया था कि 'परामर्श' (Consultation) शब्द का अर्थ 'सहमति' (Concurrence) है, और इसके तहत मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम की राय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी होगी।
3. 'नब्बेवां संविधान संशोधन अधिनियम, 2011' के माध्यम से 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' (NJAC) की स्थापना की गई थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 'चौथे न्यायाधीश मामला (2015)' में संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक और शून्य घोषित कर दिया था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 200' के अंतर्गत राज्यपाल की किसी विधेयक पर अनुमति देने, रोकने या राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखने की शक्ति तथा इससे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत जब राज्य के विधानमंडल द्वारा कोई विधेयक पारित कर राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल के पास यह शक्ति होती है कि वह उस पर अपनी अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है, या विधेयक को (धन विधेयक को छोड़कर) पुनर्विचार के लिए राज्य विधानमंडल को वापस भेज सकता है।
2. राज्यपाल के पास यह संवैधानिक विवेकाधिकार है कि वह किसी भी साधारण विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित (Reserve) कर सकता है, और संविधान में ऐसी कोई समय-सीमा या मानदंड निर्धारित नहीं किए गए हैं जिसके तहत राज्यपाल के लिए यह अनिवार्य हो कि वह इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह से ही करे या इसे एक निश्चित अवधि के भीतर वापस करे।
3. 'संसदीय लोकतंत्र' और 'संघवाद' (Federalism) के सिद्धांतों के मद्देनजर, उच्चतम न्यायालय द्वारा विभिन्न न्यायिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि राज्यपाल द्वारा विधेयक पर अनुमति रोकने या उसे राष्ट्रपति के लिए आरक्षित करने का निर्णय पूरी तरह से उसकी व्यक्तिगत और अनियंत्रित राजनीतिक इच्छा पर आधारित होता है, जिसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) किसी भी परिस्थिति में नहीं की जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
भारतीय इतिहास, कला एवं संस्कृति के संदर्भ में, 'महायान बौद्ध धर्म' (Mahayana Buddhism) के विकास, इसकी दार्शनिक मान्यताओं और कला में इसके प्रभावों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महायान संप्रदाय ने बुद्ध को एक ऐतिहासिक महापुरुष और शिक्षक के रूप में मानने के स्थान पर एक अलौकिक और दिव्य स्वरूप प्रदान किया, जो ब्रह्मांड का रक्षक है और जिसे विभिन्न रूपों में 'त्रिकाय' (Dharmakaya, Sambhogakaya, Nirmanakaya) के सिद्धांत के माध्यम से समझाया गया है।
2. महायान बौद्ध धर्म में व्यक्तिगत मोक्ष (अहर्त आदर्श) की तुलना में 'बोधिसत्व' (Bodhisattva) के मार्ग को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई, जिसके तहत बोधिसत्व वे परोपकारी प्राणी हैं जो बुद्धत्व प्राप्त करने के बहुत करीब होने के बावजूद अन्य सभी संसारी जीवों को दुखों से मुक्ति दिलाने के लिए स्वयं अपने निर्वाण में देरी करते हैं।
3. गांधार और मथुरा कला शैलियों के उद्भव से पहले बौद्ध कला में बुद्ध की उपस्थिति केवल प्रतीकों (जैसे पदचिह्न, छाता, स्तूप या बोधि वृक्ष) के माध्यम से दर्शाई जाती थी, किंतु महायान मत के उदय और बोधिसत्वों की अवधारणा के लोकप्रिय होने के बाद ही भारतीय मूर्तिकला में प्रथम बार बुद्ध और विभिन्न बोधिसत्वों की मानवीकृत (Anthropomorphic) मूर्तियों का निर्माण बड़े पैमाने पर शुरू हुआ।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
→
हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
→
भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in
to add to quiz, bookmark, or report issues.