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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 161' के अंतर्गत राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) तथा इसकी सीमाओं और न्यायिक समीक्षा के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को उस विषय संबंधी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्राप्त है जिस विषय तक राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है।
  2. 2. 'हरगोविन्द पंत बनाम रघुनाथ सिंह (1979)' और अन्य मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की तरह राज्यपाल को भी किसी भी मामले में 'मृत्युदंड' (Death Sentence) को पूरी तरह से क्षमा करने या माफ करने की संवैधानिक शक्ति प्राप्त है।
  3. 3. 'राज्य बनाम सतीश (2023)' या अन्य हालिया निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि यदि कोई राज्य विधानमंडल किसी ऐसे विषय पर कानून बनाता है जिसके तहत मृत्युदंड या कारावास का प्रावधान है, तो राज्यपाल की अनुच्छेद 161 के अधीन क्षमादान शक्ति मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना पूरी तरह से उनके व्यक्तिगत स्वविवेक पर निर्भर होती है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 161 के अनुसार, राज्यपाल को उस विषय संबंधी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्राप्त है, जिस विषय तक राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है। कथन 2 गलत है: राष्ट्रपति (अनुच्छेद 72 के तहत) और राज्यपाल (अनुच्छेद 161 के तहत) की क्षमादान शक्तियों में दो प्रमुख अंतर हैं- पहला, राष्ट्रपति की शक्ति संघ सूची और समवर्ती सूची दोनों के मामलों पर लागू होती है जबकि राज्यपाल की शक्ति केवल राज्य सूची और समवर्ती सूची के उन विषयों तक सीमित है जिन पर राज्य की कार्यकारी शक्ति का विस्तार है। दूसरा, और सबसे महत्वपूर्ण, राज्यपाल को किसी भी परिस्थिति में 'मृत्युदंड' (Death Sentence) को पूरी तरह से क्षमा (Pardon) करने की शक्ति प्राप्त नहीं है (हालांकि वह मृत्युदंड के मामलों में भी निलंबन, परिहार या लघुकरण कर सकता है)। मृत्युदंड को पूरी तरह से माफ करने की अनन्य शक्ति केवल भारत के राष्ट्रपति के पास है। कथन 3 गलत है: राज्यपाल की क्षमादान शक्ति का प्रयोग भी (अनुच्छेद 161) मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह (Aid and Advice) के अनुसार ही किया जाता है, न कि पूरी तरह से राज्यपाल के व्यक्तिगत स्वविवेक पर, सिवाय उन कुछ विशेष स्थितियों के जहाँ संविधान द्वारा उन्हें स्वविवेक से कार्य करने के लिए स्पष्ट रूप से अधिकृत किया गया है। साथ ही, यह शक्ति भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है यदि इसका प्रयोग मनमाने, दुर्भावनापूर्ण या असंवैधानिक आधार पर किया जाए।
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NGT अधिनियम की धारा 14 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि अधिकरण के समक्ष पर्यावरण से जुड़े किसी भी विवाद या आवेदन को उस कारण के उत्पन्न होने की तारीख से 'छह महीने' की अवधि के भीतर दायर किया जाना अनिवार्य है, किंतु अधिकरण के पास यह विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power) है कि वह पर्याप्त कारणों से संतुष्ट होने पर इस अवधि को अधिकतम 'अतिरिक्त साठ दिन' (60 days) तक बढ़ा सकता है। 3. 'वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980' और 'जैविक विविधता अधिनियम, 2002' को NGT के वैधानिक क्षेत्राधिकार की पहली अनुसूची (Schedule I) में शामिल किया गया है, किंतु 'वन अधिकार अधिनियम, 2006' (Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers Act, 2006) को इसके क्षेत्राधिकार से पूर्णतः बाहर रखा गया है, जिसके कारण वनवासियों के अधिकारों से जुड़े मामलों की सुनवाई NGT द्वारा नहीं की जा सकती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता संरक्षण के संदर्भ में, 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010' (National Green Tribunal Act, 2010) के अंतर्गत स्थापित 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (NGT) की शक्तियों, अधिकार क्षेत्र और सीमाओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) को भारत के संविधान के 'अनुच्छेद 21' के अंतर्गत प्रदत्त जीवन के अधिकार के तहत स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को लागू करने का वैधानिक जनादेश प्राप्त है, और यह अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के कड़े प्रक्रियात्मक नियमों से बंधा नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) द्वारा निर्देशित होता है। 2. 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'विशेष संदर्भ संख्या 1 of 2002 (गुजरात दंगा मामला)' तथा अन्य पूर्ववर्ती मामलों में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए किसी भी संदर्भ (Reference) पर अपनी राय देना उच्चतम न्यायालय के लिए पूर्णतः बाध्यकारी (Binding) है, और न्यायालय किसी भी परिस्थिति में अपनी राय देने से इनकार नहीं कर सकता है। 3. अनुच्छेद 143 के खंड (2) के तहत यदि संविधान लागू होने से पहले की किसी संधि, समझौते, प्रसंविदा, सनद या अन्य वैसे ही लिखतों से उत्पन्न कोई विवाद राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय को परामर्श के लिए भेजा जाता है, तो न्यायालय के लिए उस पर अपनी राय देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति (Pardoning Power) तथा इसकी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को ऐसे किसी भी मामले में जिसमें दंड या दंडादेश ऐसे विषय संबंधी विधि के विरुद्ध दिया गया है जिस तक संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है, क्षमा, प्राвилंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्राप्त है, और यह शक्ति राज्यपाल की अनुच्छेद 161 के अधीन शक्ति से इस मायने में भिन्न है कि यह मृत्युदंड (Death Sentence) के मामलों में भी पूरी तरह लागू होती है। 2. 'मार्की आंतोनियो बनाम महाराष्ट्र राज्य' और 'एके रॉय बनाम भारत संघ' जैसे मामलों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति एक विशुद्ध रूप से कार्यकारी विशेषाधिकार है, और न्यायालय को किसी भी परिस्थिति में इस बात की न्यायिक समीक्षा करने का कोई अधिकार नहीं है कि राष्ट्रपति ने दया याचिका को स्वीकार किया है या अस्वीकार। 3. 'इEपर बनाम तमिलनाडु राज्य (2006)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह व्यवस्था दी कि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का प्रयोग करते समय यदि केंद्र सरकार की सलाह के विपरीत कोई निर्णय लिया जाता है या यदि यह शक्ति दुर्भावनापूर्ण, मनमाने ढंग से या किसी अप्रासंगिक और भेदभावपूर्ण आधार (जैसे धर्म, जाति या राजनीतिक संबद्धता) पर प्रयोग की जाती है, तो यह न्यायिक समीक्षा के दायरे के अंतर्गत आती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? → हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है? → भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था। 2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है। 3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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