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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 72' के अंतर्गत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियों (Pardoning Powers) तथा इससे संबंधित न्यायिक निर्णयों और सीमाओं के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को किसी ऐसे अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति प्राप्त है, जिसके लिए दंड ऐसे विषय संबंधी संघ सूची की कार्यकारी शक्ति के विस्तार से बाहर के मामलों में भी दिया गया हो।
- 2. 'मारू राम बनाम भारत संघ (1980)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 72 के तहत क्षमादान की शक्ति का प्रयोग पूरी तरह से उनके व्यक्तिगत स्वविवेक (Discretionary Power) पर आधारित है, और इस पर केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह या सहायता (Aid and Advice) का होना संवैधानिक रूप से अनिवार्य नहीं है।
- 3. 'एकीकृत मानवीय बनाम तमिलनाडु राज्य' तथा अन्य हालिया निर्णयों में सर्वोच्च न्यायालय ने यह व्यवस्था दी है कि यदि राज्यपाल किसी मामले में राज्य सूची के अंतर्गत क्षमादान याचिका पर एक उचित समय सीमा (जैसे कि वर्षों तक) के भीतर निर्णय लेने में विफल रहता है, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 72 के तहत उसी मामले में सीधे हस्तक्षेप करके दोषी की दया याचिका पर विचार कर सकते हैं, क्योंकि राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का दायरा व्यापक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: संविधान के अनुच्छेद 72 के अनुसार राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति उन सभी मामलों तक विस्तारित है जहाँ दंड या दंडादेश ऐसे विषय संबंधी विधि के विरुद्ध दिया गया है जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार है, तथा उन मामलों में भी जहाँ सेना न्यायालय (Court Martial) द्वारा दंड दिया गया है अथवा मृत्युदंड दिया गया है।
कथन 2 गलत है: 'मारू राम बनाम भारत संघ (1980)' और 'शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974)' मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति (और राज्यपाल) अपनी क्षमादान शक्तियों का प्रयोग अपनी व्यक्तिगत मर्जी से नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह (Aid and Advice) के अनुसार ही करते हैं।
कथन 3 सही है: सर्वोच्च न्यायालय ने कई मामलों में यह माना है कि यदि संवैधानिक पदाधिकारी (जैसे राज्यपाल) दया याचिकाओं पर अत्यधिक और अनुचित विलंब करते हैं, तो न्यायहित में न्यायिक हस्तक्षेप या सुधारात्मक उपाय अपनाए जा सकते हैं, तथा राष्ट्रपति के पास भी व्यापक संवैधानिक प्रावधानों के तहत गंभीर मामलों में स्थिति की नजाकत को देखते हुए विधिक क्षेत्राधिकार का दायरा रहता है। अतः कथन 1 और 3 सही हैं।
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 143' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के 'सलाहकार क्षेत्राधिकार' (Advisory Jurisdiction) तथा इससे संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति को यह शक्ति प्राप्त है कि यदि उसे प्रतीत होता है कि विधि या तथ्य का कोई ऐसा प्रश्न उत्पन्न हुआ है या उत्पन्न होने की संभावना है, जो सार्वजनिक महत्व का है, तो वह उस प्रश्न को विचार के लिए उच्चतम न्यायालय को रिपोर्ट कर सकता है और न्यायालय ऐसी रिपोर्ट दे सकता है जो वह ठीक समझे।
2. 'विशेष संदर्भ संख्या 1 of 2002 (गुजरात दंगा मामला)' तथा अन्य पूर्ववर्ती मामलों में उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया है कि अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए किसी भी संदर्भ (Reference) पर अपनी राय देना उच्चतम न्यायालय के लिए पूर्णतः बाध्यकारी (Binding) है, और न्यायालय किसी भी परिस्थिति में अपनी राय देने से इनकार नहीं कर सकता है।
3. अनुच्छेद 143 के खंड (2) के तहत यदि संविधान लागू होने से पहले की किसी संधि, समझौते, प्रसंविदा, सनद या अन्य वैसे ही लिखतों से उत्पन्न कोई विवाद राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय को परामर्श के लिए भेजा जाता है, तो न्यायालय के लिए उस पर अपनी राय देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'भूमध्यसागरीय जलवायु' (Mediterranean Climate) की विशेषताओं और इसके भौगोलिक वितरण के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इस प्रकार की जलवायु का विस्तार मुख्य रूप से महाद्वीपों के पश्चिमी किनारों पर लगभग 30° से 45° उत्तर और दक्षिण अक्षांशों के बीच पाया जाता है, जहाँ गर्मियों में पछुआ पवनें (Westerlies) और सर्दियों में व्यापारिक पवनें (Trade Winds) प्रभावी होती हैं।
2. यहाँ की सबसे विशिष्ट जलवायु विशेषता 'शुष्क ग्रीष्मकाल' (Dry Summers) और 'वर्षा ऋतु का शीतकाल में होना' है, जिसका मुख्य कारण सर्दियों में उपोष्णकटिबंधीय उच्चदाब पेटियों (Subtropical High-Pressure Belts) का ध्रुवीय दिशा में खिसकना है।
3. भूमध्यसागरीय जलवायु क्षेत्र अपनी खट्टे फलों (Citrus Fruits) की कृषि के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं, क्योंकि यहाँ की वर्षा मुख्य रूप से चक्रवातीय प्रकार की होती है जो पछुआ पवनों के प्रभाव से शीतकाल में होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 355' और 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत केंद्र की आपातकालीन शक्तियों और राज्यों के संवैधानिक उत्तरदायित्वों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 355 के तहत संघ का यह कर्तव्य है कि वह बाह्य आक्रमण और आंतरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की रक्षा करे और प्रत्येक राज्य की सरकार का इस संविधान के उपबंधों के अनुसार चलाया जाना सुनिश्चित करे।
2. 'एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 355 के अंतर्गत आंतरिक अशांति या बाह्य आक्रमण के गंभीर संकट की स्थिति में केंद्र सरकार को किसी राज्य सरकार की सहमति के बिना भी राज्य में अपने सुरक्षा बलों (अर्धसैनिक बलों) को तैनात करने का पूर्ण अधिकार है।
3. अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन लागू करने की शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब राज्यपाल की रिपोर्ट प्राप्त हो; यदि राज्यपाल की रिपोर्ट के बिना राष्ट्रपति अपनी प्रेरणा से या किसी अन्य स्रोत से प्राप्त सूचना के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू करते हैं, तो वह उद्घोषणा संवैधानिक रूप से शून्य (Void) मानी जाएगी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 200' और 'अनुच्छेद 201' के अंतर्गत राज्य की विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर राज्यपाल की शक्तियों तथा राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयक सुरक्षित रखने के संवैधानिक प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 200 के अनुसार, जब राज्य के विधानमंडल द्वारा कोई विधेयक पारित कर दिया जाता है और उसे राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल के पास यह विकल्प होता है कि वह अनुमति दे सकता है, अनुमति रोक सकता है, या विधेयक को (धन विधेयक को छोड़कर) राज्य विधानमंडल के पास पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है।
2. 'राज्य सरकार बनाम तमिलनाडु राज्य (2023)' और अन्य हालिया न्यायिक निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि यदि राज्यपाल किसी विधेयक पर अपनी अनुमति रोक लेता है (Pocket Veto या Absolute Veto का प्रयोग करता है), तो उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह उस विधेयक को यथाशीघ्र मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखे, क्योंकि राज्यपाल का यह निर्णय पूरी तरह से उसका अंतिम स्वविवेक है जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
3. अनुच्छेद 201 के तहत यदि कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रखा जाता है, तो राष्ट्रपति के लिए यह कानूनी रूप से अनिवार्य है कि वह छह महीने के भीतर अपनी अनुमति दे या रोक ले, और यदि राष्ट्रपति उस पर अपनी अनुमति रोक लेते हैं, तो राज्य विधानमंडल उस विधेयक को दोबारा साधारण बहुमत से पारित करके राष्ट्रपति की अनुमति को दरकिनार कर सकता है।
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हुरुन ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडेक्स 2026 में भारत की रैंक क्या है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग IVक' (मूल कर्तव्य - अनुच्छेद 51क) तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए विभिन्न निर्णयों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मूल कर्तव्यों को मूल संविधान में शामिल नहीं किया गया था, बल्कि इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की संस्तुति पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संविधान के भाग IVक में जोड़ा गया, और वर्तमान में संविधान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं जिन्हें वर्ष 2002 के 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा अंतिम बार संशोधित किया गया था।
2. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51क के अंतर्गत उल्लिखित सभी 11 मूल कर्तव्य प्रकृति से वाद योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि यदि कोई नागरिक अपने किसी मूल कर्तव्य का पालन नहीं करता है, तो उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के तहत सीधे रिट याचिका जारी की जा सकती है।
3. 'रंगनाथ मिश्रा बनाम भारत संघ' (2003) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि मूल कर्तव्यों को केवल कानूनी रूप से लागू करने या दण्डित करने का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए, बल्कि देश में नागरिकों के बीच इनके प्रति जन-जागरूकता पैदा की जानी चाहिए और इन्हें कानून के अन्य प्रावधानों के साथ समेकित करके लागू किया जाना चाहिए।
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