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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 129' और 'अनुच्छेद 215' के अंतर्गत 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) तथा 'न्यायिक अवमानना' (Contempt of Court) के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार उच्चतम न्यायालय और अनुच्छेद 215 के अनुसार उच्च न्यायालय 'अभिलेख न्यायालय' होते हैं, जिसका अर्थ यह है कि उनके सभी निर्णय, अभिलेख और न्यायिक कार्यवाही स्थायी स्मरण और साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखे जाते हैं और किसी भी अन्य न्यायालय में उनकी प्रामाणिकता पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता है।
  2. 2. 'न्यायिक अवमानना अधिनियम, 1971' के अंतर्गत अवमानना को 'सिविल अवमानना' (Civil Contempt) और 'आपराधिक अवमानना' (Criminal Contempt) में वर्गीकृत किया गया है, और आपराधिक अवमानना के अंतर्गत किसी न्यायिक कार्यवाही की निष्पक्षता को पूर्वाग्रहित करना या न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करना शामिल है।
  3. 3. 'प्रशांत भूषण अवमानना मामला (2020)' और 'बरवारा मामला' में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(a)) असीमित नहीं है और न्यायालय की आलोचना के नाम पर न्यायपालिका की गरिमा को धूमिल करने वाले बयानों पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए उच्च न्यायालयों को भी सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बिना आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने का पूर्ण अधिकार है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: संविधान का अनुच्छेद 129 (उच्चतम न्यायालय के लिए) और अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालयों के लिए) इन्हें 'अभिलेख न्यायालय' (Court of Record) घोषित करता है। इसका तात्पर्य यह है कि इनके निर्णय और कार्यवाही हमेशा के लिए दर्ज रहते हैं तथा इनकी प्रामाणिकता पर किसी अन्य अदालत में सवाल नहीं उठाया जा सकता। इसके अतिरिक्त, इन्हें अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति भी प्राप्त है। कथन 2 सही है: 'न्यायिक अवमानना अधिनियम, 1971' की धारा 2 के तहत अवमानना को दो भागों में बांटा गया है: (क) सिविल अवमानना (न्यायालय के किसी आदेश, डिक्री या वचन का जानबूझकर उल्लंघन) और (ख) आपराधिक अवमानना (ऐसा कोई भी कार्य जिससे न्यायालय की अवमानना होती हो, उसकी प्रातिष्ठा घटती हो, या न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप होता हो)। कथन 3 गलत है: उच्च न्यायालयों के पास भी अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति है (अनुच्छेद 215 के तहत), किंतु 'न्यायिक अवमानना अधिनियम, 1971' की धारा 15 के अनुसार, आपराधिक अवमानना के मामलों में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने या कार्यवाही शुरू करने की शक्ति कुछ विशेष शर्तों के अधीन है, और उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत ही इसे आगे बढ़ाया जाता है। इसके अलावा, उच्च न्यायालयों को किसी अन्य उच्च न्यायालय या अधीनस्थ न्यायालय से जुड़े मामलों में आपराधिक अवमानना की कार्यवाही करने के लिए भारत के महान्यायवादी (Attorney General) या महाधिवक्ता (Advocate General) की लिखित सहमति की आवश्यकता होती है। अतः कथन 3 का यह भाग कि उच्च न्यायालय बिना किसी प्रक्रियात्मक प्रतिबंध के किसी भी मामले में अवमानना कार्यवाही कर सकते हैं, पूर्णतः सही नहीं है। इसलिए विकल्प (a) सही है।
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