BaalVikas
Menu

त्वरित लिंक्स

Civil services
4 views

प्राचीन भारतीय इतिहास, कला और संस्कृति के संदर्भ में, मौर्योत्तर काल (Post-Maurya Period) की वास्तुकला, मूर्तिकला और बौद्ध धर्म के विकास के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. मौर्योत्तर काल के दौरान स्तूप वास्तुकला में उल्लेखनीय प्रगति हुई, और मध्य प्रदेश स्थित 'भारहुत' तथा 'सांची' के स्तूपों की वेदिकाओं (Railings) और तोरणद्वारों (Gateways) पर पत्थरों की नक्काशी का कार्य मुख्य रूप से शुंग और सातवाहन राजवंशों के संरक्षण में किया गया था।
  2. 2. इस काल में गंधार और मथुरा मूर्तिकला शैलियों का विकास हुआ, जहाँ गंधार शैली पर ग्रीक-रोमन (हेलेनिस्टिक) प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है और बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण मुख्य रूप से काले नीले रंग के सिस्ट पत्थर (Grey-Schist) या मड-प्लास्टर से किया गया, जबकि मथुरा शैली में लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) का प्रयोग किया गया।
  3. 3. 'अमरावती कला शैली', जो मुख्य रूप से कृष्णा-गोदबारी घाटी में सातवाहन शासकों के संरक्षण में विकसित हुई, ने बुद्ध की मानवरूप (Anthropomorphic) मूर्तियों के निर्माण को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया और केवल प्रतीकों (जैसे पदचिह्न और छत्र) के माध्यम से ही बौद्ध धर्म के सिद्धांतों को दर्शाया।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 सही है: मौर्योत्तर काल में (विशेषकर शुंग और सातवाहन राजवंशों के अधीन) स्तूप वास्तुकला का अभूतपूर्व विकास हुआ। मूल रूप से अशोक द्वारा ईंटों से निर्मित सांची और भारहुत के स्तूपों का विस्तार किया गया तथा उनकी वेदिकाओं और तोरणद्वारों पर प्रस्तर (पत्थर) की सुंदर नक्काशी और शिल्पकारी का कार्य शुंग तथा सातवाहन काल में ही किया गया। कथन 2 सही है: गंधार और मथुरा कला शैलियाँ कुषाण काल (विशेष रूप से कनिष्क के शासनकाल) में अपनी चरमोत्कर्ष पर पहुँचीं। गंधार कला पर उत्तर-पश्चिमी संपर्क के कारण ग्रीक-रोमन (हेलेनिस्टिक) प्रभाव था, जिसमें धूसर शिस्ट (Grey-Schist) पत्थर का उपयोग हुआ। वहीं, मथुरा कला पूरी तरह से स्वदेशी थी और इसमें धब्बेदार लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) का उपयोग किया गया। दोनों ही शैलियों में बुद्ध की मानवरूप मूर्तियों का बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ। कथन 3 गलत है: अमरावती कला शैली (जो सातवाहन और इक्ष्वाकु शासकों के संरक्षण में फली-फूलित हुई) ने बुद्ध की मानवरूप (Anthropomorphic) मूर्तियों के निर्माण को अस्वीकार नहीं किया था, बल्कि अमरावती और नागार्जुनकोंडा के स्तूपों की आकृतियों में बुद्ध के जीवन की घटनाओं और उनकी मानव मूर्तियों को भी संगमरमर (White Marble) जैसी सामग्री पर अत्यंत जीवंत और गतिशील रूप में उकेरा गया है। प्रतीकों का विशेष रूप से प्रारंभिक भारहुत और सांची के प्रथम चरण में अधिक प्रयोग हुआ था, जबकि अमरावती शैली अपनी कथात्मक (Narrative) मूर्तिकला और बुद्ध की मानवरूप प्रस्तुति के लिए प्रसिद्ध है।
Share:

Related Questions

भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) तथा इससे संबंधित न्यायिक निर्णयों और प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 356 के अनुसार, यदि किसी राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा राष्ट्रपति को यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य की सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाई जा सकती है, तो राष्ट्रपति उद्घोषणा द्वारा उस राज्य सरकार के सभी या कोई कृत्य अपने हाथ में ले सकते हैं। 2. 'एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)' मामले में उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया था कि राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा न्यायोचित (Justiciable) है और न्यायालय इस बात की न्यायिक समीक्षा कर सकता है कि क्या वह संतुष्टि प्रासंगिक और यथेष्ट सामग्री पर आधारित थी या नहीं, तथा दुर्भावनापूर्ण (Malafide) होने पर उद्घोषणा को रद्द किया जा सकता है। 3. अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा जारी किए जाने की तारीख से दो महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है, और यदि इस अवधि के दौरान लोकसभा का विघटन हो जाता है, तो यह उद्घोषणा स्वतः समाप्त हो जाती है और इसके पुनर्गठन के बाद नए सिरे से अनुमोदन लेना कानूनी रूप से संभव नहीं है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'भाग III' के अंतर्गत प्रदत्त 'मूल अधिकारों' (Fundamental Rights) और उनके प्रवर्तन से संबंधित निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान का अनुच्छेद 13 यह सुनिश्चित करता है कि राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगा जो भाग III द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनता है या उनका अल्पीकरण करता है, और इस प्रयोजन के लिए 'विधि' (Law) शब्द के अंतर्गत केवल संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए अधिनियम (Acts) ही शामिल हैं, न कि अध्यादेश, उप-विधियाँ, नियम, या रूढ़ियाँ। 2. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट (Writs) जारी करने की शक्ति प्राप्त है, और यह अधिकार स्वयं में एक मूल अधिकार है, जबकि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 के तहत रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है जो उच्च न्यायालयों की न्यायक्षेत्रीय शक्ति का हिस्सा है न कि मूल अधिकार। 3. अनुच्छेद 33 संसद को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह सशस्त्र बलों, अर्ध-सैनिक बलों, पुलिस बलों और खुफिया एजेंसियों के सदस्यों के मूल अधिकारों पर प्रतिबंध या उनका पूर्ण निरसन (Abrogation) कर सके ताकि उनके द्वारा अपने कर्तव्यों का उचित निर्वाह और अनुशासन सुनिश्चित किया जा सके, तथा ऐसी विधि बनाने की यह शक्ति केवल संसद के पास है, राज्य विधानमंडलों के पास नहीं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारत में आधुनिक पुलिस व्यवस्था का जनक किसे माना जाता है? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 356' के अंतर्गत 'राष्ट्रपति शासन' (President's Rule) के प्रावधानों और 'एस.आर. बोम्मई वाद' (S.R. Bommai Case) के ऐतिहासिक निर्णयों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रपति शासन की घोषणा के लिए यह आवश्यक है कि संबंधित राज्य के राज्यपाल की रिपोर्ट प्राप्त हो, और राज्यपाल की रिपोर्ट के बिना राष्ट्रपति अपनी प्रेरणा से या किसी अन्य सूचना के आधार पर राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल होने की घोषणा नहीं कर सकता है। 2. राष्ट्रपति द्वारा जारी की गई राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा उसकी तारीख से दो महीने के भीतर अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है, और यदि इस अवधि के दौरान संसद के दोनों सदनों द्वारा इसका अनुमोदन कर दिया जाता है, तो यह उद्घोषणा प्रत्येक छह महीने पर संसद की स्वीकृति से अधिकतम तीन साल की अवधि तक बढ़ाई जा सकती है। 3. सर्वोच्च न्यायालय ने एस.आर. बोम्मई वाद (1994) में यह स्पष्ट किया कि राज्य में राष्ट्रपति शासन की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे से बाहर है और यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हो जाता है, तो न्यायालय उस विषयगत संतुष्टि या राज्यपाल के मूल्यांकन पर प्रश्नचिह्न नहीं लगा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 143' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के 'सलाहकार क्षेत्राधिकार' (Advisory Jurisdiction) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रपति विधि या तथ्य के किसी ऐसे व्यापक सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय की राय प्राप्त करना expedient (समीचीन) प्रतीत हो, सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श मांग सकता है, और इस प्रकार के परामर्श को देने के लिए सर्वोच्च न्यायालय बाध्य है। 2. यदि राष्ट्रपति द्वारा संविधान-पूर्व किसी संधि, समझौते, प्रसंविदा, सनद या अन्य ऐसी ही प्रवृत्तियों से उत्पन्न किसी विवाद पर परामर्श मांगा जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय के लिए अपनी राय देना संवैधानिक रूप से अनिवार्य (Mandatory) है। 3. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सलाहकार क्षेत्राधिकार के अंतर्गत दी गई राय या सलाह राष्ट्रपति के लिए किसी भी परिस्थिति में बाध्यकारी (Binding) नहीं होती है, और न ही यह निर्णय न्यायिक दृष्टांत (Judicial Precedent) के रूप में अन्य न्यायालयों पर लागू होती है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
Log in to add to quiz, bookmark, or report issues.