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भारतीय पर्यावरण कानून और 'राष्ट्रीय हरित अधिकरण' (National Green Tribunal - NGT) की विधिक संरचना, शक्तियों तथा न्यायिक समीक्षा के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत स्थापित एनजीटी (NGT) देश का एकमात्र ऐसा विशेष वैधानिक निकाय है जिसे पर्यावरण से जुड़े मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के सख्त नियमों का पालन करने से छूट प्राप्त है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) के आधार पर कार्य करता है।
- 2. NGT को पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन या प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय क्षति से जुड़े मामलों में आदेश, निर्देश या निर्णय देने की व्यापक शक्ति प्राप्त है, किंतु यह अधिकरण संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारक्षेत्र की तरह स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की विधिक शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता है, जब तक कि कोई औपचारिक याचिका या आवेदन न दायर किया जाए।
- 3. राष्ट्रीय हरित अधिकरण के किसी आदेश, निर्णय या पुरस्कार के विरुद्ध अपील सीधे उच्चतम न्यायालय में ही की जा सकती है, और अधिकरण के निर्णय के खिलाफ देश के किसी भी उच्च न्यायालय के समक्ष रिट अधिकारक्षेत्र (Article 226/227) के तहत चुनौती नहीं दी जा सकती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 सही है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत स्थापित NGT सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के सख्त नियमों से बाध्य नहीं है और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के आधार पर कार्य करता है।
कथन 2 सही है: NGT अधिनियम, 2010 के मूल प्रावधानों के अनुसार अधिकरण को स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेने की स्पष्ट शक्ति प्राप्त नहीं थी (यद्यपि हाल के कुछ न्यायिक मामलों में इस पर चर्चा हुई है, किंतु वैधानिक रूप से यह औपचारिक याचिकाओं पर ही कार्य करता है और उच्च न्यायालयों की तरह अनुच्छेद 226 जैसी व्यापक स्वतः संज्ञान शक्ति इसमें निहित नहीं मानी जाती)।
कथन 3 गलत है: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 22 के अनुसार NGT के आदेश के खिलाफ अपील सीधे उच्चतम न्यायालय में की जा सकती है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि उच्च न्यायालयों का संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत प्राप्त न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का अधिकार समाप्त हो गया है। मद्रास उच्च न्यायालय और अन्य निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि NGT के आदेशों के विरुद्ध संबंधित उच्च न्यायालयों में रिट याचिका दायर की जा सकती है।
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भारतीय पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता के संदर्भ में, 'वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972' [Wildlife (Protection) Act, 1972] और इसके वर्ष 2022 में किए गए महत्वपूर्ण संशोधनों के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 के माध्यम से अधिनियम की मूल अनुसूचियों (Schedules) की संख्या को छह से घटाकर चार कर दिया गया है, जिसमें अब वन्यजीवों की सामान्य प्रजातियों के लिए दो अनुसूचियाँ, पादप प्रजातियों (Plant Species) के लिए एक अनुसूची, और 'साइट्स' (CITES - Convention on International Trade in Endangered Species) के परिशिष्टों के तहत आने वाले नमूनों के लिए एक अलग अनुसूची शामिल की गई है।
2. इस संशोधन अधिनियम के अंतर्गत 'स्थायी समिति' (Standing Committee) के गठन का प्रावधान किया गया है जो राज्य वन्यजीव बोर्ड (State Board for Wildlife) के स्थान पर संरक्षित क्षेत्रों के भीतर और आसपास विभिन्न विकास परियोजनाओं को सीधे संस्तुति दे सकती है, जिससे अनुमोदन प्रक्रिया में तेजी आई है।
3. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत 'राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड' (National Board for Wildlife - NBWL) एक वैधानिक सलाहकार निकाय है, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है, और इसके उपाध्यक्ष पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत 'संविधान संशोधन प्रक्रिया' और 'संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत' (Basic Structure Doctrine) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के भाग XX के अनुच्छेद 368 के तहत संसद को संविधान के किसी भी उपबंध का संशोधन करने की शक्ति प्राप्त है, किंतु इस प्रक्रिया के तहत संसद संविधान की किसी भी मूल विशेषता या मूल संरचना को निरस्त या नष्ट नहीं कर सकती है।
2. कुछ विशिष्ट संविधान संशोधनों (जैसे राष्ट्रपति के निर्वाचन की प्रक्रिया, केंद्र और राज्यों की कार्यकारी शक्तियों का विस्तार, या सातवीं अनुसूची की कोई सूची) के लिए संसद के दोनों सदनों के विशेष बहुमत के साथ-साथ देश के कुल राज्यों में से कम से कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुसमर्थन (Ratification) का होना अनिवार्य होता है।
3. केशवानंद भारती वाद (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति की कोई सीमा नहीं है और संसद मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी हिस्से को पूरी तरह से समाप्त कर सकती है, जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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लोकमान्य (Lokmanya) की उपाधि से किसे विभूषित किया गया था?
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पृथ्वी अपने अक्ष पर कितने डिग्री झुकी हुई है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 32' के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की 'रिट अधिकारिता' (Writ Jurisdiction) और इसके अनुप्रयोग के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय केवल मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए ही रिट जारी कर सकता है, और यह अनुच्छेद स्वयं में एक मौलिक अधिकार है, जिसके कारण डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इसे 'संविधान का हृदय और आत्मा' कहा था।
2. उच्च न्यायालयों की रिट अधिकारिता (अनुच्छेद 226) का दायरा सर्वोच्च न्यायालय की तुलना में अधिक विस्तृत है, क्योंकि उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के साथ-साथ किसी अन्य कानूनी या वैधानिक अधिकार (Legal Rights) के उल्लंघन होने पर भी रिट जारी कर सकते हैं।
3. संसद विधि द्वारा किसी अन्य न्यायालय (उच्च न्यायालयों को छोड़कर) को सर्वोच्च न्यायालय की स्थानीय सीमाओं के भीतर अनुच्छेद 32 के तहत प्रदत्त सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए सशक्त कर सकती है, और इसके लिए संविधान में अनुच्छेद 139 का प्रावधान किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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