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भारतीय अर्थव्यवस्था में 'मुद्रास्फीति' (Inflation) के माप और सूचकांकों के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- 1. 'थोक मूल्य सूचकांक' (WPI) की गणना करते समय विनिर्मित उत्पादों (Manufactured Products) के भारांश (Weight) को प्राथमिक वस्तुओं (Primary Articles) की तुलना में सबसे अधिक महत्व दिया जाता है, और इसमें सेवाओं (Services) के मूल्य में होने वाले परिवर्तनों को भी प्रत्यक्ष रूप से शामिल किया जाता है।
- 2. 'उपभोक्ता मूल्य सूचकांक - संयुक्त' (CPI-Combined) का संकलन और प्रकाशन सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अंतर्गत राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा किया जाता है, जो ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के लिए खुदरा कीमतों के रुझान को मापता है।
- 3. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा मौद्रिक नीति समिति (MPC) के माध्यम से मुद्रास्फीति के लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting) के लिए प्राथमिक बेंचमार्क के रूप में WPI के आंकड़ों का उपयोग किया जाता है, न कि CPI (Combined) का।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
✓ Correct! Well done.
✗ Not quite — the correct answer is highlighted above.
Detailed Explanation
कथन 1 असत्य है: थोक मूल्य सूचकांक (WPI) में वस्तुओं के थोक भावों को शामिल किया जाता है, लेकिन इसमें सेवाओं (Services) के मूल्य में होने वाले परिवर्तनों को प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं किया जाता है (यह केवल वस्तुओं पर आधारित है)। हालांकि, विनिर्मित उत्पादों का भारांश WPI में सबसे अधिक होता है, किंतु सेवाओं की अनुपस्थिति के कारण यह कथन गलत हो जाता है।
कथन 2 सत्य है: 'उपभोक्ता मूल्य सूचकांक - संयुक्त' (CPI-Combined) का संकलन एवं प्रकाशन सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के अधीन राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा किया जाता है, जो ग्रामीण, शहरी और संपूर्ण देश के लिए खुदरा मुद्रास्फीति को मापता है।
कथन 3 असत्य है: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मौद्रिक नीति फ्रेमवर्क समझौते के तहत मुद्रास्फीति के लक्ष्यीकरण (Inflation Targeting - 4% +/- 2%) के लिए प्राथमिक संकेतक के रूप में 'उपभोक्ता मूल्य सूचकांक - संयुक्त' (CPI-Combined) को अपनाया है, न कि WPI को।
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भारतीय और विश्व भूगोल के संदर्भ में, 'महासागरीय धाराओं' (Ocean Currents) और उनके निर्माण तथा प्रभाव को प्रभावित करने वाले कारकों के विषय में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महासागरीय धाराएँ महासागरों में जल का एक निश्चित दिशा में निरंतर प्रवाह है, जो पृथ्वी के घूर्णन के कारण उत्पन्न होने वाले 'कोरिऑलिस बल' (Coriolis Force) के प्रभाव से उत्तरी गोलार्ध में अपनी मूल दिशा से दाईं ओर और दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर विक्षेपित हो जाती हैं।
2. 'एल निनो' (El Niño) और 'ला निना' (La Niña) की परिघटनाएँ प्रशांत महासागर की उष्णकटिबंधीय धाराओं से जुड़ी हुई हैं, जहाँ एल निनो के दौरान पेरू के तट पर ठंडी धारा का प्रभाव बढ़ जाता है, जिससे दक्षिण अमेरिकी तट पर भारी वर्षा और भारतीय मानसून पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
3. 'ग्ल्फ स्ट्रीम' (Gulf Stream) एक प्रमुख उष्ण महासागरीय धारा है जो मैक्सिको की खाड़ी से उत्पन्न होकर उत्तर-पूर्वी अटलांटिक महासागर की ओर बढ़ती है, और इसके प्रभाव से पश्चिमी यूरोप के बंदरगाह उच्च अक्षांशों पर स्थित होने के बावजूद सर्दियों में भी बर्फ से मुक्त और खुले रहते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय अर्थव्यवस्था और सतत विकास के संदर्भ में, 'हरित बॉन्ड' (Green Bonds) और भारत में उनके नियमन तथा विमोचन के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हरित बॉन्ड एक प्रकार का निश्चित आय वाला साधन है जिसे विशेष रूप से जलवायु और पर्यावरण के अनुकूल परियोजनाओं—जैसे कि नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता और स्वच्छ परिवहन—के वित्तपोषण के लिए धन जुटाने के लिए डिज़ाइन किया जाता है।
2. भारत में सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड (Sovereign Green Bonds) फ्रेमवर्क के तहत जुटाई गई राशि को देश के समेकित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा किया जाता है और इसे सरकार के सामान्य बजट घाटे को पूरा करने के लिए किसी भी विकासात्मक या प्रशासनिक कार्य में उपयोग किया जा सकता है।
3. भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने कॉरपोरेट हरित बॉन्ड जारी करने वालों के लिए 'SEBI (सूचीकरण दायित्व और विमोचन आवश्यकताएँ) विनियम, 2015' के अंतर्गत हरित ऋण पत्रों के निर्गम और प्रकटीकरण के कड़े मानदंड निर्धारित किए हैं, ताकि 'ग्रीनवॉशिंग' (Greenwashing) की संभावना को रोका जा सके।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 368' के अंतर्गत संविधान संशोधन प्रक्रिया और इससे संबंधित प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन करने की शक्ति केवल संसद को प्राप्त है, और इस प्रयोजन के लिए विधेयक को संसद के किसी भी सदन में पुनः स्थापित किया जा सकता है, जिसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेना अनिवार्य होता है।
2. संविधान के कुछ विशिष्ट प्रावधानों (जैसे राष्ट्रपति के निर्वाचन, संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार, या सातवीं अनुसूची की सूचियाँ) में संशोधन करने के लिए न केवल संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत (Special Majority) से पारित होना आवश्यक है, बल्कि कम-से-कम आधे राज्यों के विधानमंडलों द्वारा साधारण बहुमत से उनका अनुसमर्थन (Ratification) किया जाना भी अनिवार्य है।
3. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह व्यवस्था दी थी कि संसद अनुच्छेद 368 के तहत अपनी संशोधन शक्ति का प्रयोग करते हुए संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, यहाँ तक कि वह संविधान की 'मूल संरचना' (Basic Structure) में भी परिवर्तन या संशोधन कर सकती है, बशर्ते वह विशेष बहुमत से पारित हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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भारत का मानक समय ग्रीनविच समय (GMT) से कितना आगे है?
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भारतीय राजव्यवस्था और संविधान के संदर्भ में, भारतीय संविधान के 'अनुच्छेद 20' (Article 20) के अंतर्गत प्रदत्त अधिकारों और सुरक्षा उपायों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 20 किसी व्यक्ति को 'पूर्व-दा्र्शिक आपराधिक विधियों' (Ex-post facto criminal laws) के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है, जिसके तहत किसी भी व्यक्ति को ऐसे कार्य के लिए जो किए जाने के समय अपराध नहीं था, दोषी नहीं ठहराया जा सकता और न ही उस अपराध के लिए उस समय प्रवृत्त कानून द्वारा दी जाने वाली सजा से अधिक सजा दी जा सकती है।
2. अनुच्छेद 20 के खंड (2) के तहत निहित 'दोहरे खतरे' (Double Jeopardy) के सिद्धांत के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित किया जा सकता है, बशर्ते मामला सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता हो।
3. अनुच्छेद 20 के खंड (3) के अंतर्गत किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति को 'स्वयं अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य' (Self-incrimination) नहीं किया जा सकता है, और यह संरक्षण न केवल आपराधिक न्यायालयों में बल्कि पुलिस हिरासत या पूछताछ के दौरान दिए गए बयानों पर भी पूरी तरह लागू होता है।
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