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भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में, वर्ष 1922 में घटित 'चौरी-चौरा कांड' और उसके पश्चात महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन को वापस लेने के निर्णय के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. 1. चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने बारामولی (Bardoli) में कांग्रेस की कार्य समिति की बैठक बुलाई, जहाँ आंदोलन को पूरी तरह से समाप्त करने का निर्णय लिया गया और देश के अन्य हिस्सों में चल रहे सविनय अवज्ञा आंदोलनों को भी रोकने का आदेश दिया गया।
  2. 2. इस घटना से क्षुब्ध होकर सुभाष चंद्र बोस और चित्तरंजन दास जैसे युवा नेताओं ने गांधीजी के इस निर्णय की कड़ी आलोचना की, जबकि जवाहरलाल नेहरू और मोतीलाल नेहरू ने इस निर्णय को एक रणनीतिक और व्यावहारिक कदम मानकर इसका पूर्ण समर्थन किया।
  3. 3. आंदोलन की अचानक वापसी के विरोध में वर्ष 1923 में चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने कांग्रेस के भीतर ही 'स्वराज पार्टी' (Swaraj Party) की स्थापना की, जिसका मुख्य उद्देश्य परिषदों में प्रवेश कर सरकार की नीतियों में बाधा डालना था।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

Detailed Explanation

कथन 1 गलत है: चौरी-चौरा की घटना (5 फरवरी 1922) के बाद गांधीजी ने बारडोली (Bardoli) में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक बुलाई थी, न कि बारामولی में। उस बैठक में असहयोग आंदोलन को समाप्त करने का निर्णय लिया गया था, लेकिन देश के अन्य हिस्सों में चल रहे सामूहिक सविनय अवज्ञा (जैसे कर न अदायगी अभियान) को भी स्थगित करने का निर्देश दिया गया था, हालांकि यह कथन आंशिक रूप से तथ्यात्मक रूप से भ्रामक है क्योंकि नेहरू और चित्तरंजन दास की प्रतिक्रिया के संदर्भ में कथन 2 भी त्रुटिपूर्ण है। कथन 2 गलत है: सुभाष चंद्र बोस, चित्तरंजन दास, मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू सभी ने आंदोलन की अचानक वापसी पर निराशा या क्षोभ व्यक्त किया था। मोतीलाल नेहरू और जवाहरलाल नेहरू (जो उस समय जेल में थे) ने भी गांधीजी के इस निर्णय को अव्यवहारिक और निराशाजनक माना था। किसी भी प्रमुख नेता ने उस समय इसका पूर्ण समर्थन नहीं किया था, बल्कि सभी युवा और राष्ट्रवादी नेता हताश थे। कथन 3 सही है: आंदोलन के अचानक स्थगन से उत्पन्न राजनीतिक शून्यता और निराशा के बाद, चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने गया अधिवेशन (1922) के बाद कांग्रेस से अलग होकर जनवरी 1923 में 'कांग्रेस-खिलाफत स्वराज पार्टी' की स्थापना की, जिसका उद्देश्य परिषदों में प्रवेश कर 'असहयोग भीतर से' करना था।
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