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Indian Polity
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भारतीय संविधान का कौन सा अनुच्छेद संशोधन प्रक्रिया (Amendment Procedure) का वर्णन करता है?

Detailed Explanation

अनुच्छेद 368 संसद को संविधान संशोधन की शक्ति प्रदान करता है।
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भारतीय संविधान के भाग III के अंतर्गत प्रदत्त मूल अधिकारों (Fundamental Rights) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान का अनुच्छेद 16(4A) राज्य को किसी भी वर्ग के नागरिकों के पक्ष में राज्य के अधीन सेवाओं में ऐसे पदों के लिए आरक्षण के लिए उपबंध करने की शक्ति देता है, जो राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैं, और इसे 77वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1995 द्वारा जोड़ा गया था। 2. अनुच्छेद 20(3) के अनुसार किसी भी अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति को अपने ही विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य (Self-incrimination) नहीं किया जा सकता, और यह सुरक्षा केवल न्यायालयीन कार्यवाहियों तक ही सीमित है, जबकि प्रशासनिक जाँच या विभागीय पूछताछ के दौरान यह अधिकार लागू नहीं होता है। 3. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय जाने के अधिकार को एक मूल अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है, जिसके तहत सर्वोच्च न्यायालय बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट जारी कर सकता है, तथा राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी अनुच्छेद 20 और 21 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत राष्ट्रपति की अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति (अनुच्छेद 123) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति संसद की विधि बनाने की शक्ति के सह-विस्तृत (co-extensive) है, जिसका अर्थ है कि राष्ट्रपति केवल उन्हीं विषयों पर अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता है जिन पर संसद कानून बनाने की शक्ति रखती है। 2. सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक 'डी.सी. वाधवा वाद (1987)' के निर्णय के अनुसार, राज्य या केंद्र स्तर पर अध्यादेशों का बार-बार पुनरप्रख्यापन (re-promulgation) संवैधानिक धोखाधड़ी और कार्यपालिका की तानाशाही माना गया है, क्योंकि यह विधायिका के प्रति कार्यपालिका की जवाबदेही को कमजोर करता है। 3. राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया प्रत्येक अध्यादेश संसद के पुनः समवेत होने के ठीक छह सप्ताह की अवधि के भीतर या उससे पूर्व ही दोनों सदनों द्वारा अस्वीकार किए जाने वाले संकल्प के पारित होने पर स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है, किंतु यदि दोनों सदन अलग-अलग तारीखों पर पुनः समवेत होते हैं, तो छह सप्ताह की यह गणना उस तिथि से की जाएगी जिस तारीख को बाद वाला सदन सत्र में आता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 316 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जबकि राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, किंतु SPSC के सदस्यों को हटाने की शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास निहित है, राज्यपाल के पास नहीं। 2. संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य अपने पद से हटने के पश्चात संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर, किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर, या संघ अथवा राज्य की किसी अन्य लोक सेवा के अधीन किसी अन्य नियोजन के लिए पूर्णतः पात्र होते हैं। 3. अनुच्छेद 323 के अनुसार संघ लोक सेवा आयोग अपने कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपता है, जिसे राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाते हैं, और इसी प्रकार राज्य लोक सेवा आयोग अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपता है जिसे राज्यपाल राज्य के विधानमंडल के समक्ष रखवाते हैं। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संसद की विधाई प्रक्रिया और वित्तीय विधेयकों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 109 के अनुसार धन विधेयक (Money Bill) केवल लोकसभा में ही पुनः स्थापित किया जा सकता है और इसे पारित कराने के लिए राज्यसभा की पूर्व संस्वीकृति या अनुमोदन अनिवार्य होता है, जबकि साधारण विधेयक को संसद के किसी भी सदन में आरंभ किया जा सकता है। 2. वित्त विधेयक (Financial Bill - श्रेणी I), अनुच्छेद 117(1) के अंतर्गत, धन विधेयक के समान ही केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है और इसके संबंध में भी दोनों सदनों के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए अनुच्छेद 108 के तहत संयुक्त बैठक (Joint Sitting) बुलाने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। 3. जब लोकसभा द्वारा कोई धन विधेयक पारित करके राज्यसभा में भेजा जाता है, तो राज्यसभा के पास इस विधेयक को अस्वीकार करने या संशोधित करने की शक्ति नहीं होती है, और वह इसे अधिकतम चौदह दिनों की अवधि तक ही रोक सकती है, जिसके पश्चात राज्यसभा की सहमति के बिना भी वह दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? भारतीय संविधान के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका, विशेष रूप से राज्यपाल की शक्तियों, अध्यादेश निर्माण अधिकार तथा मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के संबंधों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: 1. संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत राज्यपाल को राज्य विधानमंडल के सत्र में न होने की स्थिति में अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है, और राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित ऐसा अध्यादेश उसी प्रकार का बल और प्रभाव रखता है जैसा कि राज्य विधानमंडल द्वारा पारित अधिनियम का होता है, किंतु इसके लिए राष्ट्रपति के निर्देशों की कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में (जैसे यदि समान उपबंध वाला विधेयक राज्य विधानमंडल में प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व संस्वीकृति आवश्यक होती) आवश्यकता होती है। 2. राज्यपाल की अध्यादेश निर्माण की शक्ति उसकी स्वविवेकिए शक्ति नहीं है, बल्कि वह राज्य मंत्रिमंडल (जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होता है) की सलाह और सहायता से ही इस शक्ति का प्रयोग करता है, और यदि राज्यपाल का अध्यादेश राज्य विधानमंडल के पुनरारंभ होने के छह सप्ताह के भीतर अनुमोदित नहीं किया जाता है, तो वह स्वतः निष्प्रभावी हो जाता है। 3. अनुच्छेद 164 के अंतर्गत मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर करता है, किंतु झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों के लिए संविधान के अनुच्छेद 164 के खंड (1) के परंतुक के तहत जनजातीय कल्याण मंत्री का भारसाधक एक पृथक मंत्री नियुक्त किए जाने का संवैधानिक दायित्व राज्यपाल पर अनिवार्य रूप से आरोपित किया गया है। उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
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